दुनिया के नक्शे पर ईरान सिर्फ एक देश नहीं है — यह एक जीवित सभ्यता है। जब रोम नहीं बना था, जब यूरोप के जंगलों में आदिम जनजातियाँ रहती थीं, तब फ़ारस में राजाओं के महल खड़े थे, कवियों के शब्द गूँजते थे, और व्यापारियों के काफिले भारत से भूमध्यसागर तक जाते थे।
यह देश हजारों सालों में न जाने कितने साम्राज्यों का उत्थान-पतन देख चुका है — सायरस महान से लेकर अयातुल्लाह खुमेनी तक। इसने ज़रतुश्त्र का दर्शन देखा, अरबों का हमला झेला, मंगोलों की तबाही सही, ब्रिटेन की साज़िशें समझीं और अमेरिका की दखलंदाज़ी का प्रतिरोध किया।
इस लेख में हम ईरान के इतिहास को बिना किसी पक्ष के, बिना किसी एजेंडे के, केवल तथ्यों और संदर्भों की रोशनी में समझने की कोशिश करेंगे।
भाग 1: प्राचीन फ़ारस — एक महाशक्ति का जन्म (550 ईसा पूर्व से पहले)
• सबसे पहले कौन था यहाँ?
ईरान का पठार विश्व की सबसे पुरानी मानव बस्तियों में से एक है। लगभग 7,000 साल पहले यहाँ एलामाइट सभ्यता फली-फूली, जिसका केंद्र आज के ईरान के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में था। इसके साथ ही मेसोपोटामिया (आज का इराक) के साथ इनके व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध थे।
लगभग 1,000 ईसा पूर्व के आस-पास मध्य एशिया से "आर्य" जनजातियाँ ईरानी पठार पर आईं। इन्हीं में से दो प्रमुख शाखाएं थीं — मेड्स और पर्शियन्स। मेड्स ने पहले एक साम्राज्य बनाया, लेकिन आगे चलकर पर्शियन्स ने उन्हें पराजित कर एक ऐसी सत्ता खड़ी की जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया।
• ज़रतुश्त्र और पारसी धर्म — ईरान की आत्मा
इस्लाम से भी पहले, ईरान की असली पहचान थी — ज़रतुश्त्र (Zoroaster) का धर्म। यह दुनिया के पहले एकेश्वरवादी धर्मों में से एक माना जाता है। इसमें अच्छाई (अहुरा मज़्दा) और बुराई (अहरिमन) के बीच संघर्ष की अवधारणा थी। सत्य, न्याय और अग्नि इसके प्रतीक थे।
बाद में यहूदी, ईसाई और इस्लामी धर्म-दर्शन पर ज़रतुश्त्री सोच का गहरा प्रभाव पड़ा। "स्वर्ग-नर्क", "अंतिम न्याय" जैसी अवधारणाएं इसी परंपरा से आईं।
भाग 2: अखमेनी साम्राज्य — दुनिया का पहला महाशक्ति (550–330 ईसा पूर्व)
• साइरस महान — इतिहास का पहला "उदार शासक"
550 ईसा पूर्व में साइरस द्वितीय (Cyrus the Great) ने मेड्स को हराकर अखमेनी साम्राज्य की स्थापना की। यह साम्राज्य तेज़ी से फैला — पश्चिम में मिस्र और तुर्की तक, पूर्व में भारत की सीमाओं तक।
लेकिन साइरस सिर्फ विजेता नहीं था — वह अपने युग का सबसे असाधारण शासक था। उसने बेबीलोन जीता और वहाँ के यहूदी कैदियों को मुक्त किया, उनके मंदिर पुनर्निर्माण की अनुमति दी। उसका "साइरस सिलेंडर" — एक मिट्टी का बेलनाकार दस्तावेज़ — दुनिया का पहला मानवाधिकार घोषणापत्र माना जाता है जिसमें धर्म की स्वतंत्रता और दासता के विरोध का उल्लेख है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में आज भी इस सिलेंडर की प्रतिलिपि रखी है।
• दारा और ज़ेर्क्सेस — साम्राज्य का स्वर्णकाल
साइरस के बाद दारा प्रथम (Darius I) ने साम्राज्य को और मजबूत किया। उसने पर्सेपोलिस बनवाया — एक भव्य नगर जो आज भी खंडहर रूप में शिराज़ के पास मौजूद है और यूनेस्को विश्व धरोहर है। दारा ने सड़कें बनवाईं, डाक व्यवस्था शुरू की और एकीकृत मुद्रा लागू की।
ज़ेर्क्सेस ने ग्रीस पर आक्रमण किया — थर्मोपाइली का वह युद्ध जहाँ 300 स्पार्टन सैनिकों ने लाखों फ़ारसियों को रोका था (जैसा हॉलीवुड फिल्म "300" में दिखाया गया है, हालांकि वह संख्याएं और चित्रण काफी अतिरंजित हैं)।
• सिकंदर का आगमन — साम्राज्य का अंत (330 ईसा पूर्व)
मकदूनिया के सिकंदर महान (Alexander the Great) ने 330 ईसा पूर्व में अखमेनी साम्राज्य को तोड़ दिया। पर्सेपोलिस जला दिया गया। फ़ारस पर ग्रीक शासन आया जिसे सेल्यूसिड साम्राज्य कहते हैं।
लेकिन ईरानी संस्कृति इतनी गहरी थी कि जीतने वाले खुद उसमें समा गए। सिकंदर ने खुद फ़ारसी रीति-रिवाज अपनाए, फ़ारसी राजकुमारियों से विवाह किए।
भाग 3: पार्थियन और ससानी — रोम से लोहा लेने वाले (250 ईसा पूर्व – 651 ईस्वी)
• पार्थियन साम्राज्य — रोम का सबसे बड़ा दुश्मन
ग्रीक शासन के बाद पार्थियन (Arsacid dynasty) उभरे जिन्होंने लगभग 500 साल तक ईरान पर राज किया। इस दौरान रोम और फ़ारस के बीच लगातार युद्ध होते रहे। रोम के सबसे महान जनरल भी फ़ारसियों से हारे — जिसमें Crassus (53 ईसा पूर्व में करहे की लड़ाई) शामिल है।
• ससानी साम्राज्य — फ़ारसी सभ्यता का चरमोत्कर्ष (224–651 ईस्वी)
ससानी साम्राज्य को इतिहासकार फ़ारसी सभ्यता का स्वर्णकाल मानते हैं। इसमें:
- ज़रतुश्त्री धर्म को राजधर्म बनाया गया
- चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई
- Jundishapur नामक विश्वविद्यालय स्थापित हुआ जो उस समय दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान-केंद्र था
- रोम के साथ सैकड़ों साल युद्ध और कूटनीति चलती रही
इस साम्राज्य की संस्कृति, कला, वास्तुकला और दर्शन ने बाद में इस्लामी सभ्यता को भी गहरे प्रभावित किया।
भाग 4: अरब विजय और इस्लाम का आगमन (651 ईस्वी)
• ससानी साम्राज्य का पतन
7वीं सदी में मदीना से उठी इस्लामी लहर तेज़ी से फैली। ससानी साम्राज्य उस समय रोम के साथ लंबे युद्धों से थका हुआ था, आंतरिक कलह में था। 651 ईस्वी में अरब सेनाओं ने ससानी साम्राज्य को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
• ईरान का इस्लामीकरण — एक धीमी प्रक्रिया
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना ज़रूरी है — ईरान का इस्लामीकरण रातोंरात नहीं हुआ। यह एक धीमी प्रक्रिया थी जो 8वीं से 10वीं सदी तक चली। 9वीं सदी के मध्य तक भी लगभग 40% आबादी गैर-मुस्लिम थी। 11वीं सदी तक आते-आते 90% लोग मुसलमान हो गए थे।
• फ़ारसी पहचान का पुनर्जागरण
अरबों ने ईरान जीता, लेकिन ईरान ने उन्हें सांस्कृतिक रूप से जीत लिया। फ़िरदौसी ने "शाहनामा"लिखा — फ़ारसी भाषा का महाकाव्य जिसमें ईरान की पूर्व-इस्लामी वीरगाथाएं थीं। रूमी, हाफिज़, उमर खय्याम जैसे कवि-दार्शनिक यहीं पैदा हुए। जो बाद में "इस्लामी संस्कृति" कहलाई उसका बड़ा हिस्सा असल में फ़ारसी संस्कृति था।
भाग 5: सफ़वी वंश — शिया इस्लाम की नींव (1501–1736)
•वह मोड़ जिसने सब बदल दिया
ईरान के इतिहास में 1501 एक ऐसा साल है जिसने आज के ईरान की आत्मा तय की। शाह इस्माइल प्रथम ने सफ़वी वंश की स्थापना की और शिया इस्लाम को ईरान का राजधर्म घोषित किया।
इससे पहले अधिकांश ईरानी सुन्नी मुसलमान थे। लेकिन सफ़वियों ने जबरन या प्रोत्साहन से शिया मत फैलाया। कुछ इतिहासकार इसे राजनीतिक कारणों से भी जोड़ते हैं — ऑटोमन साम्राज्य (तुर्की) सुन्नी था, और सफ़वी उससे अलग पहचान चाहते थे।
इस निर्णय के परिणाम आज तक महसूस होते हैं:
- ईरान और ऑटोमन (तुर्की) के बीच सुन्नी-शिया संघर्ष
- आज भी ईरान और सऊदी अरब की प्रतिद्वंद्विता इसी की जड़ें रखती है
- शिया इस्लाम की आध्यात्मिक राजधानी बन गया ईरान
भाग 6: क़ाजार वंश और विदेशी दखलंदाज़ी (1796–1925)
• कमज़ोर राजा, मजबूत साम्राज्यवाद
क़ाजार वंश का दौर ईरान के इतिहास में कमज़ोरी और शर्म का दौर माना जाता है। इस दौर में ईरान ने रूस और ब्रिटेन के सामने घुटने टेके:
- 1813 और 1828 की संधियों में ईरान ने कॉकेशस (अज़रबैजान, जॉर्जिया) के बड़े हिस्से रूस को दे दिए
- ब्रिटेन ने अफगानिस्तान को प्रभाव में लेकर पूर्व से ईरान को दबाया
- 1872 में नासिर-उद-दीन शाह ने ब्रिटिश व्यापारी Julius Reuter को ईरान के खनिज, रेलवे और बैंकिंग के अधिकार दे दिए — जो इतना आपत्तिजनक था कि बाद में रद्द करना पड़ा
• तेल की खोज और ब्रिटेन का आगमन
1908 में दक्षिणी ईरान में तेल मिला। अगले साल Anglo-Persian Oil Company (APOC) बनी जो बाद में BP (British Petroleum) बन गई। इस कंपनी ने ईरान के तेल पर लगभग पूरा नियंत्रण कर लिया और ईरान को मुनाफे का बहुत कम हिस्सा मिला।
• संवैधानिक क्रांति (1905–1911) — लोकतंत्र की पहली किरण
1905 में ईरान में एक ऐतिहासिक जन आंदोलन हुआ। जनता, बाज़ार के व्यापारियों और धार्मिक नेताओं ने मिलकर शाह को संविधान मानने पर मजबूर किया। ईरान में पहली बार संसद (मजलिस) बनी।
यह आंदोलन इस्लामिक दुनिया में लोकतंत्र की पहली बड़ी लहरों में से एक था। लेकिन रूस और ब्रिटेन ने इसे कमज़ोर करने की कोशिश की — उन्हें एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र ईरान नहीं चाहिए था।
भाग 7: पहलवी वंश — आधुनिकीकरण और तानाशाही (1925–1979)
• रज़ा शाह — फ़ौजी से बादशाह तक
रज़ा खान एक फ़ौजी अफसर थे जिन्होंने 1921 में तख्तापलट किया और 1925 में खुद को ईरान का शाह घोषित कर लिया — पहलवी वंश की शुरुआत।
रज़ा शाह की नीतियाँ तुर्की के अतातुर्क से प्रेरित थीं — तेज़ आधुनिकीकरण, धर्म को पीछे धकेलना, पश्चिमी शैली अपनाना:
- 1935 में देश का नाम "फ़ारस" से बदलकर "ईरान" रखा गया
- महिलाओं के लिए हिजाब पर प्रतिबंध लगाया (बलपूर्वक)
- पश्चिमी कपड़े अनिवार्य किए गए, टोपी पर रोक
- मस्जिदों में कुर्सियाँ रखने का आदेश — धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची
- आधुनिक विश्वविद्यालय, सड़कें, रेलवे बने
इन सुधारों से देश आगे बढ़ा, लेकिन धार्मिक वर्ग में गहरी नाराज़गी पैदा हुई।
1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन और सोवियत संघ ने ईरान पर कब्ज़ा कर लिया और रज़ा शाह को जबरन हटाकर उनके बेटे को गद्दी पर बिठाया।
• मोसादेक और तेल राष्ट्रीयकरण (1951–1953) — लोकतंत्र का गला घोंटा गया
मोहम्मद मोसादेक ईरान के इतिहास के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक थे। 1951 में वे प्रधानमंत्री बने और उन्होंने एक क्रांतिकारी कदम उठाया — ब्रिटिश तेल कंपनी का राष्ट्रीयकरण।
उनका तर्क सीधा था: "ईरान की धरती का तेल ईरानियों का है।"
लेकिन ब्रिटेन और अमेरिका को यह मंज़ूर नहीं था। 1953 में CIA और MI6 ने मिलकर ऑपरेशन AJAX चलाया — एक गुप्त तख्तापलट जिसमें मोसादेक को हटाया गया और शाह को पूरी तरह सत्ता सौंपी गई।
यह घटना ईरानी मानस में गहरी छाप छोड़ गई। आज भी जब ईरान "पश्चिम पर भरोसा नहीं" कहता है — तो 1953 इसकी जड़ में है।
• मोहम्मद रज़ा शाह — "आधुनिकता" और दमन का दोहरा चेहरा
रज़ा शाह के बेटे मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी ने 1941 से 1979 तक शासन किया। उनका दौर दो हिस्सों में बँटा था:
एक तरफ आधुनिकता:
- "श्वेत क्रांति" (1963) — भूमि सुधार, महिलाओं को मतदान अधिकार, साक्षरता अभियान
- तेल की बढ़ती आमदनी से तेहरान एक आधुनिक शहर बना
- यूरोप-अमेरिका जैसी जीवनशैली उच्च वर्ग में फैली
- महिलाएं मंत्री, जज और पायलट बनीं
- 1971 में पर्सेपोलिस में 2,500 साल के फ़ारसी साम्राज्य का भव्य जश्न मनाया गया
दूसरी तरफ दमन:
- SAVAK — शाह की खुफिया पुलिस जो CIA की मदद से बनी थी। इसपर भयानक यातनाएं देने के आरोप थे
- राजनीतिक विरोधियों को जेल, निर्वासन या मृत्यु
- संसद कठपुतली, प्रेस पर सेंसर
- 1976 में इस्लामी कैलेंडर हटाकर "शाही कैलेंडर" लागू किया — धार्मिक वर्ग में भारी आक्रोश
भाग 8: 1979 की क्रांति — दुनिया बदल गई
• क्यों हुई क्रांति?
1979 की ईरानी क्रांति केवल "धार्मिक" क्रांति नहीं थी — यह कई असंतुष्ट धाराओं का विस्फोट था:
1. धार्मिक वर्ग — रज़ा शाह की धर्मविरोधी नीतियों से नाराज़ मुल्ला और आयतुल्लाह
2. वामपंथी और राष्ट्रवादी — 1953 के तख्तापलट और अमेरिकी दखल से क्षुब्ध
3. बाज़ारी व्यापारी — आर्थिक नीतियों से नाराज़
4. शिक्षित युवा — SAVAK के दमन से आज़ाद होना चाहते थे
5. गरीब जनता — तेल की दौलत असमान रूप से बँटी थी
• अयातुल्लाह खुमेनी — एक अनोखा नेता
अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमेनी 1964 से ईरान से निर्वासित थे — पहले तुर्की, फिर इराक, अंत में फ्रांस। वहाँ से वे टेप रिकॉर्डिंग के ज़रिए ईरान में संदेश भेजते थे जो मस्जिदों में बजाए जाते थे।
खुमेनी ने एक नई अवधारणा दी — "विलायत-ए-फ़क़ीह" — यानी इस्लामी विद्वान को सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार होना चाहिए। यह शिया इस्लाम की परंपरागत सोच से अलग था।
16 जनवरी 1979 — शाह ईरान छोड़कर चले गए। उनके जाने पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे।
1 फरवरी 1979 — खुमेनी फ्रांस से वापस आए। 60 लाख लोगों ने उनका स्वागत किया।
1 अप्रैल 1979 — जनमत संग्रह हुआ। 98% ने "इस्लामिक रिपब्लिक आफ ईरान " के पक्ष में वोट दिया (हालाँकि मतदान की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं)।
• क्रांति का दूसरा चेहरा
शुरुआत में क्रांति में कम्युनिस्ट, उदारवादी और इस्लामवादी सब साथ थे। लेकिन सत्ता मिलने के बाद खुमेनी ने धीरे-धीरे बाकी सभी को हाशिए पर कर दिया:
- हज़ारों पूर्व शाह समर्थकों को फाँसी
- वामपंथी नेताओं की गिरफ्तारी
- महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य
- मिश्रित शिक्षा और मनोरंजन पर पाबंदी
- "इस्लाम विरोधी" करार देकर विरोधियों का दमन
भाग 9: खुमेनी का शासन (1979–1989) — आग के दस साल
• अमेरिकी दूतावास बंधक संकट (1979–1981)
नवंबर 1979 में ईरानी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा कर 52 अमेरिकी कर्मचारियों को 444 दिन तक बंधक बनाए रखा। इसने ईरान और अमेरिका के रिश्तों को हमेशा के लिए बदल दिया।
अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जो आज 45 साल बाद भी किसी न किसी रूप में जारी हैं।
• ईरान-इराक युद्ध (1980–1988) — आठ साल का नरक
22 सितंबर 1980 को इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया। उन्हें लगा कि नई क्रांतिकारी सरकार कमज़ोर है और आसानी से झुक जाएगी।
वे गलत निकले।
यह युद्ध 8 साल तक चला। इसमें:
- दोनों तरफ मिलाकर 5 से 10 लाख लोग मारे गए
- ईरान में "बसीज" — स्वयंसेवी मिलिशिया उभरा जिसमें किशोर तक शामिल हुए
- इराक ने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया — अमेरिका ने जानते हुए भी चुप रहा
- अमेरिका, सऊदी अरब और खाड़ी देश इराक का साथ दे रहे थे
- 1988 में अमेरिकी नौसेना ने एक ईरानी यात्री विमान को मार गिराया — 290 लोग मारे गए
इस युद्ध ने ईरानी समाज में एक गहरा घाव छोड़ा। लेकिन इसने इस्लामिक सत्ता को भी मजबूत किया — युद्धकाल में विरोध करना मुश्किल हो गया।
• 1988 का नरसंहार — एक काला अध्याय
1988 में युद्ध खत्म होने के बाद खुमेनी के आदेश पर जेलों में बंद हज़ारों राजनीतिक कैदियों को फाँसी दी गई। अनुमानतः 3,000 से 30,000 लोग मारे गए। यह घटना अभी भी ईरान में निषिद्ध विषय है।
• खुमेनी की मृत्यु (1989)
3 जून 1989 को खुमेनी की मृत्यु हुई। उनके जनाज़े में लाखों लोग थे — कुछ सच्चे शोक में, कुछ भय से।
भाग 10: खामेनेई का युग — सर्वोच्च नेता (1989–2026)
• अली खामेनेई — एक अप्रत्याशित उत्तराधिकारी
अली खामेनेई खुमेनी जितने बड़े धार्मिक विद्वान नहीं थे। उनकी धार्मिक योग्यता कम थी। लेकिन विशेषज्ञ परिषद ने उन्हें चुना क्योंकि वे राजनीतिक रूप से विश्वसनीय थे।
खामेनेई का शासन 37 सालों तक चला। इस दौरान ईरान ने कई उतार-चढ़ाव देखे।
• रफसंजानी का युग — व्यावहारिक राजनीति (1989–1997)
राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफसंजानी ने अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता दी। युद्ध के बाद पुनर्निर्माण हुआ। कुछ उदारीकरण भी आया। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित रही।
• खातमी का "सुधारवाद" (1997–2005) — उम्मीद और निराशा
मोहम्मद खातमी "सुधारवादी" राष्ट्रपति थे। उनकी जीत ने दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने "सभ्यताओं के संवाद" की बात की, प्रेस की आज़ादी बढ़ाई, विश्वविद्यालयों में खुलापन आया।
लेकिन सर्वोच्च नेता खामेनेई ने हर बड़े सुधार को रोक दिया। अदालतों ने सुधारवादी अखबार बंद करवाए। युवाओं की उम्मीदें धीरे-धीरे टूटीं।
• अहमदीनेजाद — टकराव की राजनीति (2005–2013)
महमूद अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति बनते ही ईरान की विदेश नीति आक्रामक हो गई। उन्होंने होलोकॉस्ट को "मिथ्या" कहा, इज़राइल को नक्शे से मिटाने की बात कही, और परमाणु कार्यक्रम को तेज़ किया।
2009 में चुनावी धाँधली के आरोपों पर "हरित आंदोलन" (Green Movement) उभरा — लाखों लोग सड़कों पर आए। सरकार ने बल से दबाया।
• रूहानी और परमाणु समझौता (2013–2021)
हसन रूहानी ने अमेरिका के साथ JCPOA (2015) — परमाणु समझौता — किया। इसमें ईरान ने परमाणु गतिविधियाँ सीमित की और बदले में प्रतिबंध हटे।
2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा यह समझौता तोड़ दिया और "अधिकतम दबाव" नीति अपनाई। ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई।
• "महसा" आंदोलन (2022) — ईरान काँप उठा
सितंबर 2022 में 22 वर्षीय महसा (झीना) अमीनी की "नैतिकता पुलिस" की हिरासत में मृत्यु हो गई। आरोप था कि हिजाब सही से न पहनने पर उन्हें हिरासत में लिया गया था।
इसके बाद ईरान में "ज़न, ज़िंदगी, आज़ादी" (औरत, जीवन, आज़ादी) के नारे के साथ एक विशाल आंदोलन उभरा। महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से हिजाब जलाए। यह 1979 के बाद सबसे बड़ा विरोध था।
सरकार ने फिर से बल प्रयोग किया — सैकड़ों मारे गए, हज़ारों गिरफ्तार हुए। लेकिन इस बार समाज में दरार पहले से कहीं गहरी थी।
भाग 11: 2024–2026 — अंतिम संघर्ष
• इज़राइल-हमास युद्ध का असर
अक्टूबर 2023 में इज़राइल-हमास युद्ध छिड़ा। ईरान ने हमास, हिज़्बुल्लाह और यमन के हूती विद्रोहियों को समर्थन दिया। इज़राइल ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर हमले किए।
2024 में पहली बार ईरान ने सीधे इज़राइल पर 300 से अधिक ड्रोन और मिसाइलें दागीं — जो इज़राइल और पश्चिमी देशों ने रोक लीं।
• 2026 — एक नया अध्याय
फरवरी 2026 में ईरान-इज़राइल-अमेरिका तनाव चरम पर पहुँचा। अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई सहित दर्जनों वरिष्ठ अधिकारी मारे गए। ईरान में 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। खामेनेई की मृत्यु के बाद ईरान एक अभूतपूर्व राजनीतिक शून्य में है। 37 साल बाद नए सर्वोच्च नेता की खोज हो रही है।
निष्कर्ष: ईरान को समझना क्यों ज़रूरी है?
ईरान एक ऐसा देश है जिसे केवल "कट्टरपंथी" या "दुश्मन" कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
यह वह भूमि है जिसने दुनिया को साइरस का मानवाधिकार, रूमी की कविता, अलजेब्रा की गणित और पारसी वास्तुकला दी।
यह वह देश है जिसने 1953 में लोकतंत्र खोया — विदेशी षड्यंत्र से — और उसके घाव आज तक नहीं भरे।
यह वह समाज है जहाँ आज भी करोड़ों युवा बदलाव चाहते हैं — जो "ज़न, ज़िंदगी, आज़ादी" कहते हैं।
और यह वह राज्य है जिसकी सत्ता एक ऐसी विचारधारा के हाथ में है जो अपनी वैधता के लिए धर्म का सहारा लेती है — और हर असहमति को "अमेरिकी षड्यंत्र" बताकर दबाती है।
ईरान का इतिहास हमें यह सिखाता है कि सभ्यताएं जटिल होती हैं, बाहरी दखल का इतिहास लंबा है, और जनता का गुस्सा आखिरकार रास्ता खोज ही लेता है।
Website:- omkarvichar.com
Writer:- Omkar Singh
यह लेख किसी राजनीतिक विचारधारा, सरकार या संगठन का समर्थन या विरोध नहीं करता। इसका उद्देश्य केवल ऐतिहासिक तथ्यों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करना है।
(स्रोत: Wikipedia (History of Iran), PBS NewsHour, Al Jazeera, Transform Iran, History Hit, Gulf Inc. Foreign Affairs Forum.)
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