राजनीति में अपराधीकरण
— लोकतंत्र का काला सच
जब कानून तोड़ने वाले ही कानून बनाने लगें — भारतीय राजनीति की इस बीमारी की पूरी कहानी, शुरुवात से आज तक
- 01. परिचय — समस्या क्या है?
- 02. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — शुरुवात कहाँ से हुई?
- 03. वोहरा कमेटी रिपोर्ट 1993 — पहला बड़ा खुलासा
- 04. आंकड़े जो चौंका दें — 2009 से 2025 तक
- 05. कारण — यह होता क्यों है?
- 06. प्रभाव — लोकतंत्र पर क्या असर?
- 07. कानूनी प्रयास — सुप्रीम कोर्ट और कानून
- 08. आलोचनात्मक दृष्टिकोण — असली सवाल क्या हैं?
- 09. समाधान — रास्ता क्या है?
- 10. निष्कर्ष
1. परिचय — जब अपराधी ही कानून बनाने लगें
लोकतंत्र की नींव यह है कि जनता अपने प्रतिनिधि खुद चुने — ऐसे लोग जो ईमानदार हों, जनसेवा में विश्वास रखते हों और कानून का सम्मान करते हों। लेकिन भारतीय राजनीति में एक विचित्र और भयावह प्रवृत्ति देखी जाती है — जो लोग खुद अपराधी हैं, वे ही कानून बनाने वाली संस्थाओं में पहुँच जाते हैं।
यही है राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Politics)। यह कोई नई समस्या नहीं है, न ही यह केवल एक राज्य या एक पार्टी की समस्या है। यह एक ऐसी व्यवस्थागत बीमारी है जो दशकों से भारतीय लोकतंत्र को खोखला करती आ रही है।
जब आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति — जिन पर हत्या, बलात्कार, अपहरण या भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हों — राजनीतिक दलों से टिकट पाकर चुनाव लड़ें, जीतें और विधानसभाओं व संसद में पहुँचें, तो इस प्रक्रिया को "राजनीति का अपराधीकरण" कहते हैं। इसमें दो स्तर होते हैं: (1) अपराधियों का राजनीति में प्रवेश, और (2) राजनीतिज्ञों का अपराध की दुनिया से गहरा जुड़ाव।
यह समस्या केवल आंकड़ों की नहीं है। यह उस मूल्यबोध का संकट है जिस पर हमारे संविधान निर्माताओं ने इस देश का भविष्य टिकाया था। जब बाहुबली (muscle power) और धनबली (money power) मिलकर मतपेटियों पर कब्ज़ा कर लेते हैं, तो लोकतंत्र का असली अर्थ ही खो जाता है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — शुरुवात कहाँ से हुई?
यह समझना ज़रूरी है कि यह समस्या अचानक नहीं उभरी। इसकी जड़ें भारत के शुरुआती राजनीतिक इतिहास में ही दिखाई देती हैं।
स्वतंत्रता के बाद का दौर (1947–1960s)
आज़ादी के तुरंत बाद भारत में लोकतंत्र नया-नया था। उस दौर में बड़े ज़मींदार, पूर्व रजवाड़े और स्थानीय दबंग आसानी से चुनाव जीतते थे क्योंकि उनके पास संसाधन और प्रभाव दोनों थे। उस समय "अपराध" की परिभाषा राजनीतिक रूप से अलग थी — कई स्वतंत्रता सेनानियों पर भी ब्रिटिश कानूनों के तहत मुकदमे चले थे।
बाहुबली युग का उदय (1970–1990)
इंदिरा गाँधी के आपातकाल (1975–77) और उसके बाद के राजनीतिक उठापटक ने एक नई प्रवृत्ति को जन्म दिया। राजनीतिक दल किसी भी कीमत पर जीत चाहते थे। बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में स्थानीय गुंडे, ज़मींदार और माफिया सरगना राजनीति में खुलकर आने लगे।
इसी दौर में धन-बल और बाहु-बल का गठजोड़ हुआ। अपराधी तत्वों ने पार्टियों को चुनावी फ़ंड दिया, बूथ कैप्चरिंग में मदद की — और बदले में मिला उन्हें राजनीतिक संरक्षण और टिकट।
1990 का दशक — माफिया-राजनीति का खुला नाच
मंडल आयोग रिपोर्ट (1990) के बाद जातीय राजनीति तेज़ हुई। क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ जिन्होंने जाति-आधारित वोट बैंक बनाने के लिए दागी लेकिन "प्रभावशाली" उम्मीदवारों पर दाँव लगाया। साथ ही, 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद नया पैसा आया, नई संभावनाएं आईं — और राजनीति और भी ज़्यादा "फायदेमंद व्यवसाय" बन गई।
3. वोहरा कमेटी रिपोर्ट 1993 — पहला बड़ा सरकारी खुलासा
मार्च 1993 में मुंबई में हुए भयावह सिलसिलेवार बम धमाकों (1993 Bombay Blasts) के बाद यह साफ हो गया कि दाऊद इब्राहिम जैसे अपराधियों का नेटवर्क राजनेताओं, पुलिस और नौकरशाहों के संरक्षण के बिना इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता था। पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने जुलाई 1993 में गृह सचिव एन.एन. वोहरा की अध्यक्षता में एक समिति गठित की।
रिपोर्ट की मुख्य बातें
वोहरा कमेटी ने अक्टूबर 1993 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें खुलासा हुआ कि:
बिहार, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ये गिरोह स्थानीय नेताओं के संरक्षण में काम करते हैं। कुछ राजनीतिक नेता इन गिरोहों और सशस्त्र सेनाओं के नेता बन गए हैं और वर्षों से स्थानीय निकायों, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रीय संसद में खुद को निर्वाचित कराते रहे हैं।
4. आँकड़े जो चौंका दें — 2009 से 2025 तक
ADR (Association for Democratic Reforms) के आँकड़े बताते हैं कि यह समस्या कम होने की बजाय लगातार बढ़ रही है।
लोकसभा चुनावों में बढ़ता अपराधीकरण (2009–2024)
| चुनाव वर्ष | दागी MP (%) | गंभीर आरोप (%) | स्थिति |
|---|---|---|---|
| 2009 | 30% (158/521) | 14% | चिंताजनक |
| 2014 | 34% (186/541) | 21% | गंभीर |
| 2019 | 43% (233/543) | 29% | अत्यंत गंभीर |
| 2024 | 46% (251/543) | 31% | खतरे की घंटी |
गंभीर आरोपों वाले सांसदों का प्रतिशत 2009 में 14% से बढ़कर 2024 में 31% हो गया — यानी 15 वर्षों में दोगुने से अधिक।
पार्टी-वार दागी सांसदों का प्रतिशत (2024 लोकसभा)
राज्यवार स्थिति (MLAs, 2025)
| राज्य | आपराधिक मामले वाले MLA | गंभीर मामले |
|---|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 79% | 56% |
| केरल | 69% | — |
| तेलंगाना | 69% | 50% |
| बिहार | 66% | 49% |
| महाराष्ट्र | 65% | — |
| तमिलनाडु | 59% | — |
| उत्तर प्रदेश | ~50%+ | 38% (154 MLA) |
5. कारण — यह होता क्यों है?
यह समस्या किसी एक कारण से नहीं उपजती। इसके पीछे कई परतें हैं:
बाहुबल और धनबल का गठजोड़
चुनाव जीतने के लिए पैसा और "दबदबा" दोनों चाहिए। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के पास काला धन, संगठित गुंडों की फ़ौज और डर का वातावरण तीनों होते हैं। ये चुनावी "संसाधन" उन्हें ईमानदार उम्मीदवारों से कहीं आगे रखते हैं।
जाति और समुदाय की राजनीति
भारत में जातीय पहचान बेहद मज़बूत है। एक मतदाता अक्सर उम्मीदवार का जाति-समूह देखकर वोट करता है, उसका आपराधिक रिकॉर्ड नहीं। राजनीतिक दल इसका फायदा उठाते हैं — दागी लेकिन जाति में प्रभावशाली उम्मीदवार को टिकट मिलता है।
"रॉबिन हुड" इमेज का भ्रम
कई इलाकों में अपराधी नेता एक local hero की छवि बना लेता है — थाने में फ़ोन करके काम करवाना, दबंगों से बचाना, शादियों में पैसे देना। यह छवि वोटों में बदल जाती है, भले ही उस नेता पर हत्या के मामले क्यों न हों।
कानूनी खामियाँ और धीमी न्यायपालिका
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 के अनुसार, चुनाव लड़ने पर रोक केवल तब लगती है जब उम्मीदवार को 2 साल या उससे अधिक की सज़ा हो जाए। चार्जशीट दायर होने मात्र से कोई रोक नहीं। और भारत की अदालतों में केस सालों-दशकों चलते हैं। जनवरी 2024 तक देशभर की अदालतों में नेताओं के खिलाफ 4,472 से अधिक मुकदमे लंबित थे।
पार्टियों की "Nash Equilibrium" मजबूरी
यह शायद सबसे गहरा कारण है। हर पार्टी जानती है कि दागी उम्मीदवार देने से गलत संदेश जाता है — लेकिन अगर वो न दे और दूसरी पार्टी दे तो उसकी सीट जाएगी। इस "Game Theory" की मजबूरी में सभी दल एक-दूसरे की बराबरी करते हुए दागी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाते जाते हैं।
ADR के विश्लेषण के अनुसार, आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार साफ छवि वाले उम्मीदवारों की तुलना में अधिक बार चुनाव जीतते हैं। इसका अर्थ है कि मतदाता भी इस समस्या में एक कारक है — चाहे जानकारी के अभाव से हो या अन्य कारणों से।
6. प्रभाव — लोकतंत्र और समाज पर क्या असर?
शासन व्यवस्था का पतन
जब अपराधी पृष्ठभूमि के लोग सत्ता में होते हैं, तो वे अपने मामलों को कमज़ोर करने, पुलिस जाँच रोकने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की क्षमता रखते हैं। इससे कानून-व्यवस्था का तंत्र ही भ्रष्ट हो जाता है।
नीति-निर्माण प्रभावित
संसद और विधानसभाओं में गंभीर बहसें होनी चाहिए — शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार जैसे मुद्दों पर। लेकिन जब प्रतिनिधि खुद संदिग्ध पृष्ठभूमि के हों, तो वे जनहित की नीतियों की बजाय अपने हित की नीतियों को प्राथमिकता देते हैं।
ईमानदार उम्मीदवारों का हतोत्साहन
एक पढ़ा-लिखा, ईमानदार व्यक्ति जो राजनीति में आना चाहता हो, उसे अहसास होता है कि उसके पास न करोड़ों रुपये हैं, न गुंडों की फ़ौज। नतीजा — सबसे योग्य लोग राजनीति से दूर रहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय छवि और निवेश पर असर
V-Dem Institute (स्वीडन) की 2024 Democracy Report ने भारत को "electoral autocracy" की श्रेणी में रखा। अपराधियों के सत्ता में होने की खबरें भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुँचाती हैं और विदेशी निवेश पर भी असर डालती हैं।
7. कानूनी प्रयास — सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका
न्यायपालिका और चुनाव आयोग ने इस समस्या से लड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हालाँकि उनकी प्रभावशीलता पर सवाल उठते रहे हैं।
8. आलोचनात्मक दृष्टिकोण — असली सवाल क्या हैं?
Form 26, Lily Thomas केस, Supreme Court के आदेश — सब के बावजूद दागी MP का प्रतिशत 30% से बढ़कर 46% हो गया। इसका अर्थ है कि केवल कानूनी सुधार काफी नहीं हैं। जब तक मतदाता व्यवहार नहीं बदलता और पार्टियों की आंतरिक संस्कृति नहीं बदलती, कोई भी कानून इस समस्या को नहीं सुलझा सकता।
यहाँ एक महत्वपूर्ण नुआंस है — भारत में राजनीतिक दुश्मनी के कारण नेताओं पर झूठे या राजनीति-प्रेरित मुकदमे भी दर्ज होते हैं। इसलिए हर "दागी नेता" वास्तव में अपराधी नहीं होता। इसीलिए Supreme Court ने कहा था कि "केवल चार्जशीट के आधार पर" अयोग्यता नहीं दी जा सकती। यह balance बनाना ज़रूरी है।
शहरी पढ़ा-लिखा मध्यमवर्ग चुनावों में सबसे कम वोट डालता है। वही वर्ग जो सोशल मीडिया पर "नेता बहुत खराब हैं" कहता है, वोटिंग वाले दिन घर पर बैठा रहता है। अगर यह वर्ग मतदान में भागीदार हो, तो परिणाम बदल सकते हैं।
लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार अधिकतम 95 लाख रुपये खर्च कर सकता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह करोड़ों में होता है। जब ईमानदार उम्मीदवार के पास इतना पैसा नहीं होता, तो वह मैदान में आ ही नहीं सकता — और अपराधी माफिया-फंडेड नेता जीतते हैं। चुनावी वित्त पारदर्शिता इस लड़ाई की सबसे बड़ी चाबी है।
2018-2024 के बीच Electoral Bonds Scheme के तहत अरबों रुपये की गुमनाम फंडिंग राजनीतिक दलों को मिली। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इसे असंवैधानिक बताकर रद्द किया। लेकिन जब तक पार्टी फंडिंग की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती, काले धन और अपराध का राजनीति में प्रवेश रुकना मुश्किल है।
9. समाधान — रास्ता क्या है?
समस्या जटिल है, इसलिए समाधान भी बहुआयामी होने चाहिए:
ब्राज़ील में vote-buying और money laundering के दोषी नेताओं पर सार्वजनिक पद से आजीवन प्रतिबंध लगा। इटली में पूर्व PM Berlusconi को tax fraud में सज़ा और 5 साल के लिए office ban मिला। इन उदाहरणों से सीखकर भारत अपने सुधार की राह बना सकता है।
10. निष्कर्ष — लोकतंत्र की परीक्षा
राजनीति में अपराधीकरण कोई एक दिन की समस्या नहीं है। यह दशकों की उदासीनता, कमज़ोर कानूनों, जातीय राजनीति, काले धन और मतदाताओं की जागरूकता की कमी का संयुक्त परिणाम है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों ने कुछ बदलाव किए, लेकिन जब तक राजनीतिक दल स्वेच्छा से दागी उम्मीदवारों को टिकट देना बंद नहीं करते, तब तक कोई भी कानून पूरी तरह काम नहीं करेगा।
और जब तक मतदाता — खासकर युवा और शिक्षित वर्ग — उम्मीदवार की जाति-पार्टी देखने की जगह उसका रिकॉर्ड देखकर वोट नहीं करता, यह बदलाव नहीं आएगा।
जब कानून तोड़ने वाले ही कानून बनाने वाले बन जाएं, तो लोकतंत्र का ढाँचा खड़ा रहता है — लेकिन उसकी आत्मा मर जाती है। इस आत्मा को वापस लाने की ज़िम्मेदारी अंततः उसी नागरिक की है जो EVM पर बटन दबाता है।







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