भारत में बोलने की आज़ादी पर संकट: पत्रकार, कार्यकर्ता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर निशाने पर
लोकतंत्र की नींव चार स्तंभों पर टिकी होती है — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस। इनमें से प्रेस को अक्सर लोकतंत्र का "चौथा स्तंभ" कहा जाता है, क्योंकि यही वह शक्ति है जो सरकार से सवाल पूछती है, जनता की आवाज़ उठाती है और सच्चाई को सामने लाती है।
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| लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंताएँ सामने आई हैं। पत्रकारों पर मुकदमे, सोशल मीडिया अकाउंट्स को हटाने के सरकारी आदेश, और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स पर बढ़ती निगरानी — ये सब मिलकर एक ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं जहाँ बोलने की आज़ादी पर दबाव महसूस किया जा रहा है। |
भारत की प्रेस स्वतंत्रता: एक चिंताजनक रिपोर्ट कार्ड
2025 के World Press Freedom Index 2025 के अनुसार भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर रहा। यह रैंकिंग दर्शाती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
डिजिटल अधिकार संगठन Internet Freedom Foundation की रिपोर्ट के अनुसार 2025 की पहली तिमाही में ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े 329 मामले दर्ज किए गए, जिनमें शामिल थे:
पत्रकारों की गिरफ्तारी
सोशल मीडिया पोस्ट हटाने के आदेश
इंटरनेट शटडाउन
ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल और मीडिया स्वतंत्रता दोनों पर दबाव बढ़ रहा है।
कानूनों का इस्तेमाल: धारा 69A और आपराधिक मानहानि
IT Act की धारा 69A
भारत में ऑनलाइन कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए सबसे शक्तिशाली कानूनी प्रावधानों में से एक है Information Technology Act Section 69A।
इस धारा के तहत सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी भी ऑनलाइन सामग्री को निम्न आधारों पर हटवा सकती है:
राष्ट्रीय सुरक्षा
सार्वजनिक व्यवस्था
भारत की संप्रभुता और अखंडता
2014 में धारा 69A के तहत लगभग 471 टेकडाउन आदेश जारी किए गए थे। 2022 तक यह संख्या बढ़कर 6,775 हो गई — यानी लगभग 14 गुना वृद्धि।
जुलाई 2025 में सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में Twitter) को एक घंटे के भीतर 2,355 अकाउंट्स ब्लॉक करने का निर्देश दिया। रिपोर्टों के अनुसार इनमें कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के अकाउंट भी शामिल थे।
आपराधिक मानहानि के मामले
भारत में Criminal Defamation कानून का भी पत्रकारों और एक्टिविस्टों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहा है।
स्वतंत्र पत्रकार Abhisar Sharma और Raju Parulekar जैसे पत्रकारों पर भी मानहानि के मामले दर्ज किए गए।
मार्च 2025 में पत्रकार Dilwar Hussain Mazumdar को कथित भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के बाद गिरफ्तार किया गया था।
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स: नई पीढ़ी की आवाज़ पर नियंत्रण?
Broadcasting Services (Regulation) Bill
सरकार ने एक प्रस्तावित कानून Broadcasting Services (Regulation) Bill तैयार किया था, जिसके तहत डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स को "डिजिटल न्यूज़ ब्रॉडकास्टर" की श्रेणी में लाने की योजना थी।
इस बिल के मुख्य प्रस्ताव थे:
सरकार के पास अनिवार्य पंजीकरण
कंटेंट की समीक्षा के लिए Content Evaluation Committee
शिकायत निवारण तंत्र
नियमों के उल्लंघन पर दंड और जेल
इस बिल के विरोध में 785 से अधिक भारतीय कंटेंट क्रिएटर्स ने सरकार को पत्र लिखा।
Ranveer Allahbadia विवाद
लोकप्रिय पॉडकास्टर और यूट्यूबर Ranveer Allahbadia भी 2025 में एक विवादास्पद टिप्पणी के कारण कानूनी विवाद में आए।
इस मामले के बाद Supreme Court of India ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए आचार-संहिता और दंडात्मक दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर टिप्पणी की।
हेट क्राइम रिपोर्ट करने वालों पर खतरा
कुछ रिपोर्टों के अनुसार भारत में एक विरोधाभासी स्थिति देखी जा रही है — कई बार हेट क्राइम करने वालों से अधिक जोखिम उन लोगों को होता है जो इन घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हैं।
मानवाधिकार संगठनों के कुछ अकाउंट्स जैसे:
Hindutva Watch
India Hate Lab
Indian American Muslim Council
Hindus for Human Rights
इनके सोशल मीडिया अकाउंट्स ब्लॉक किए जाने की खबरें भी सामने आई थीं।
मीडिया संगठनों पर आर्थिक दबाव
स्वतंत्र पत्रकारिता मंच The Reporters' Collective की गैर-लाभकारी स्थिति 2025 में कर अधिकारियों द्वारा रद्द कर दी गई थी।
आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार के कदम स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता पर आर्थिक दबाव डाल सकते हैं।
कश्मीर में प्रेस की स्थिति
2019 में Abrogation of Article 370 के बाद कश्मीर में पत्रकारों ने निगरानी, पूछताछ और कानूनी कार्रवाई जैसी चुनौतियों का सामना करने की बात कही है।
‘Sahyog’ पोर्टल और सेंसरशिप की नई व्यवस्था
2025 में सरकार ने Sahyog Portal लॉन्च किया, जिसके माध्यम से जिला स्तर के अधिकारी भी सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट हटाने के निर्देश दे सकते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कंटेंट हटाने की शक्ति पहले की तुलना में अधिक विकेंद्रीकृत हो गई है।
नए IT नियम और AI कंटेंट
फरवरी 2026 में लागू Information Technology Rules 2026 के तहत कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए:
टेकडाउन आदेशों का पालन 3 घंटे के भीतर करना होगा
AI-जनित कंटेंट (Synthetic Content) की परिभाषा
नियमों के उल्लंघन पर आपराधिक कार्रवाई संभव
आलोचकों का कहना है कि डीपफेक रोकने की आवश्यकता तो है, लेकिन इन नियमों का इस्तेमाल सेंसरशिप के लिए भी हो सकता है।
इंटरनेट शटडाउन: एक बड़ा मुद्दा
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार भारत इंटरनेट शटडाउन के मामलों में दुनिया में शीर्ष देशों में शामिल रहा है।
2024 में भारत में 84 इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए।
2025 में अब तक 40 से अधिक शटडाउन रिपोर्ट किए जा चुके हैं।
डिजिटल पत्रकारिता का उभार
भारत की लगभग 71% आबादी अब ऑनलाइन माध्यम से समाचार प्राप्त करती है। इसी कारण डिजिटल पत्रकारिता और स्वतंत्र यूट्यूब पत्रकारों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है।
उदाहरण के लिए, यूट्यूबर Dhruv Rathee के वीडियो करोड़ों लोग देखते हैं और वे डिजिटल राजनीतिक विश्लेषण के प्रमुख चेहरों में से एक बन चुके हैं।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की असली परीक्षा
भारतीय संविधान का Article 19(1)(a) of the Constitution of India नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
लेकिन जब पत्रकारों की गिरफ्तारी, सोशल मीडिया अकाउंट्स का ब्लॉक होना, और डिजिटल क्रिएटर्स पर बढ़ती निगरानी जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र आलोचना को स्वीकार करने की ताकत रखता है।
एक मज़बूत लोकतंत्र वही होता है जो असहमति और आलोचना को दबाने के बजाय उसे सुनने और समझने की क्षमता रखता हो।
स्रोत
Reuters Institute for the Study of Journalism
Al Jazeera
International Bar Association
Internet Freedom Foundation
Human Rights Watch
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