लोकतंत्र में संसद का उद्देश्य सिर्फ़ विधेयक पारित करना नहीं होता, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और जवाब सुनिश्चित करना भी होता है। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने एक असहज सच्चाई उजागर की है—भारत की संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर बहस, तथ्यों से नहीं बल्कि सरकारी असुविधा की सीमाओं से तय हो रही है।
राहुल गांधी द्वारा लोकसभा में उठाया गया मुद्दा—चाहे वह डोकलाम हो या गलवान—असल में एक भौगोलिक बहस नहीं था। यह सवाल था सरकार की पारदर्शिता, जवाबदेही और असहमति को सहने की क्षमता का। दुर्भाग्यवश, सरकार ने इस सवाल का सामना तथ्यों से नहीं, बल्कि प्रक्रिया और शोर से किया।
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| (लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी (फोटो: पीटीआई)) |
सरकार की पहली विफलता: सवाल को मुद्दा बनने ही न देना
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद में जो कहा, उस पर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया लगभग तत्काल थी—स्थगन, आपत्ति और नियमों का हवाला। दिलचस्प बात यह है कि आपत्ति इस बात पर नहीं थी कि सीमा पर क्या हुआ, बल्कि इस पर थी कि किस स्रोत से उसका उल्लेख किया गया।
यह सरकार की एक पुरानी रणनीति को दोहराता है—
जब सवाल असहज हो, तो सवाल पूछने की वैधता पर ही बहस शुरू कर दो।
अगर कोई नेता कहता है कि चीनी टैंक भारतीय चौकियों की ओर बढ़े, तो लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया यह होनी चाहिए थी कि सरकार रिकॉर्ड पर साफ़ जवाब देती। इसके बजाय, बहस को “अप्रकाशित संस्मरण”, “नियमों का उल्लंघन” और “स्रोत की शुद्धता” तक सीमित कर दिया गया।
दूसरी विफलता: प्रक्रिया को ढाल बनाना
संसदीय नियम महत्वपूर्ण हैं—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन जब नियमों का इस्तेमाल सवालों को दबाने के औज़ार की तरह होने लगे, तो समस्या नियमों की नहीं, नीयत की होती है।
यह तर्क देना कि किसी अप्रकाशित संस्मरण का हवाला नहीं दिया जा सकता, तब खोखला हो जाता है जब वही अंश पहले से सार्वजनिक डोमेन में प्रकाशित हों। सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आपत्ति सामग्री से है या उसके पढ़े जाने से।
यह व्यवहार बताता है कि सरकार को तथ्य से कम और नैरेटिव से ज़्यादा चिंता है।
तीसरी विफलता: सीमा मुद्दों पर अस्पष्टता को नीति बनाना
डोकलाम बनाम गलवान की बहस ने सरकार की एक और कमजोरी उजागर की—सीमा से जुड़े मामलों पर लगातार बदलता, अधूरा या चयनात्मक संवाद।
डोकलाम (2017) और गलवान/पूर्वी लद्दाख (2020) दोनों ही घटनाएँ अलग थीं, लेकिन दोनों में एक समान तत्व था—चीन की आक्रामक गतिविधियाँ। सरकार ने इन घटनाओं पर अलग-अलग समय पर अलग-अलग भाषा अपनाई:
कभी कहा गया, “कोई घुसपैठ नहीं हुई”
कभी कहा गया, “स्थिति नियंत्रण में है”
कभी कहा गया, “एक इंच ज़मीन नहीं गई”
समस्या यह नहीं कि सरकार का आकलन गलत हो सकता है। समस्या यह है कि सरकार ने संसद को भरोसे में लेने की परंपरा ही छोड़ दी है।
चौथी विफलता: सेना के नाम पर असहमति को दबाना
सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत देने की कोशिश की कि इस तरह के सवाल सेना के मनोबल को नुकसान पहुँचाते हैं। यह एक बेहद खतरनाक तर्क है।
लोकतंत्र में सरकार और सेना के बीच फर्क स्पष्ट होता है।
सरकार पर सवाल उठाना, सेना पर सवाल उठाना नहीं होता।
जब सरकार अपने बचाव में सेना की बहादुरी को ढाल बनाती है, तो वह दरअसल सेना को राजनीतिक बहस में घसीटती है, न कि उससे दूर रखती है। यह सेना के लिए सम्मान नहीं, बल्कि असुविधाजनक स्थिति है।
पाँचवीं विफलता: सोशल मीडिया को अनौपचारिक प्रवक्ता बनने देना
इस पूरे प्रकरण में एक और पैटर्न साफ़ दिखता है—सरकार का जवाब संसद में कम और सोशल मीडिया पर ज़्यादा सक्रिय रहा।
X जैसे प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड, आरोप और काउंटर-आरोप सरकार की ओर से अनौपचारिक स्पष्टीकरण बन गए। यह एक लोकतांत्रिक विचलन है।
राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जवाब ट्रेंड से नहीं, टेबल से आने चाहिए—संसद के टेबल से।
छठी विफलता: सवाल पूछने वालों को देशद्रोही ठहराने की संस्कृति
सरकार समर्थक नैरेटिव का एक हिस्सा यह भी रहा कि ऐसे सवाल “देश की छवि खराब करते हैं”। यह तर्क लोकतंत्र के मूल विचार से उलट है।
देश की छवि सवालों से नहीं, चुप्पी से खराब होती है।
जो लोकतंत्र अपने सांसदों को सवाल पूछने से रोकता है, वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी विश्वसनीय नहीं रह पाता।
असल मुद्दा क्या है—और क्या नहीं
यह बहस इस बात पर नहीं है कि राहुल गांधी ने डोकलाम कहा या गलवान।
असल सवाल यह है:
सरकार संसद में सीमा संबंधी घटनाओं पर स्पष्ट, लिखित और जवाबदेह बयान क्यों नहीं देती?
सरकार असहमति को सिस्टम का हिस्सा मानने के बजाय खतरा क्यों मानती है?
सरकार नियमों की आड़ में राजनीतिक जवाबदेही से क्यों बचती है?
निष्कर्ष: सरकार की सबसे बड़ी कमी—आत्मविश्वास का अभाव
एक मजबूत सरकार सवालों से नहीं डरती।
एक आत्मविश्वासी सरकार आलोचना को राष्ट्रविरोध नहीं मानती।
और एक लोकतांत्रिक सरकार संसद को बाधा नहीं, संरक्षक मानती है।
इस पूरे प्रकरण ने यह दिखाया कि सरकार की सबसे बड़ी कमी नीति या शक्ति नहीं, बल्कि पारदर्शिता और संवाद का आत्मविश्वास है।
जब सरकार सवालों से भागती है, तो सवाल और बड़े हो जाते हैं।
और जब संसद को चुप कराया जाता है, तो लोकतंत्र खुद बोलने लगता है—सड़कों पर, सोशल मीडिया पर और इतिहास में।
यही इस विवाद का सबसे गहरा सबक है।

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