मेरे गांव के कोटेदार। सच्ची घटना पर आधारित कहानी।

 यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। इस कहानी में कोई काल्पनिक बातें नहीं है। यह बात उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की है, साल 2005-06 के आसपास का करीब समय होगा,उन दिनों मेरी उम्र  करीब 7-8 साल की रही होगी। मैं काफी समझदार तो नहीं था, लेकिन घर के छोटे मोटे काम मैं ही करता था, जैसे- पिताजी को खेतों पर  खाना देने जाना, बाजार से सब्जियां लाना। उन दिनों मेंरे गांव के सभी लोग खेती पर ही निर्भर थे। गांव में बहुत चहल-पहल रहती थी, बड़े-बुजुर्ग पुरानी- पुरानी बातें करते थे, गांव के आसपास के भूतिया जगहों के बारे में बताते थे और ये बातें अक्सर शाम में होती थी,दिन में खाली समय में युवा ताश के पत्ते खेलते थे। लड़के कंचे भी खेला करते थे, गांव में सभी के घर फूस के थे, यानी सबके छप्पर पड़े थे। तो ऐसा मेंरा गांव था 

(मेरे गांव की फोटो -प्रतीकात्मक)
उस समय।मेरे गांव में एक सरकारी सस्ते राशन की दुकान थी। जिसे कोटा कहा जाता था, और उसके दुकानदार को कोटेदार, तो मेरे गांव के कोटेदार का नाम था राजाराम, मेरे गांव में कई गांवों का राशन आता था, इसलिए जब राशन बटता था तो बहुत भीड़-भाड़ हो जाती थी। क्योंकि कोटेदार बड़ा ही धूर्त आदमी था,वो सारे गांवों का राशन एक ही दिन बांटता था। और उसी दिन जितने लोगों को राशन मिल गया तो ठीक नहीं तो फिर अगले दिन कोटेदार 10-12 दिन के लिए गायब, उस समय सरकारी राशन पर ज़्यादा लोग निर्भर थे, कोटेदार की इस हरकत पर लोग पीठ-पीछे बहुत गालियां देते थे, कोटेदार को ये बात भली-भांति मालूम थी, लेकिन सामने से कोई भी कोटेदार का विरोध करने की हिम्मत नहीं रखता था 
(राशन की दुकान -प्रतीकात्मक)

मेरे गांव में, इसका कारण यह था कि कोटेदार के पास ट्रैक्टर-ट्रॉली, थ्रेशर,हैरव, कैल्टीवेटर आदि थे, जिससे गांव वाले खेतों की जुताई करवाते थे, गेहूं की थ्रेशिंग करवाते थे, और बहुत से लोग कोटेदार के यहां मजदूरी करने जाते थे। और कोटेदार भी गांव के ज्यादातर लोगों को राशन दे देता था यही कारण था कि गांव में कोटेदार का कभी ज्यादा विरोध नहीं होता था, लेकिन आसपास के गांवों में स्थिति अलग थी, इसलिए समय-समय पर कोटेदार के विरुद्ध कार्रवाई के लिए प्रयास होते रहते थे, लेकिन इन सबका कोटेदार पर ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ता था। उस समय तीन प्रकार के राशनकार्ड धारक होते थे, लाल कार्ड(गरीबी रेखा में सबसे नीचे), सफेद कार्ड (BPL- गरीबी रेखा से नीचे), पीले कार्ड(APL- गरीबी रेखा से ऊपर) , लाल कार्ड वालों को 35 किलो, राशन मिलता था, 5 लीटर किरोसीन तेल, और कभी-कभी शक्कर भी मिलती थी, और सफेद कार्ड वालों को 3 लीटर किरोसीन तेल और तीन महीने बाद एक बार राशन मिलता था, और जो गरीबी रेखा से ऊपर थे यानी पीले कार्ड वालों को सिर्फ किरोसीन तेल ही मिलता था। ये तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूं कि ये सारी चीजें कोटेदार से लेना एक जंग जीतने के बराबर था, उस समय जब कोटेदार से राशन मिल जाता था इतनी भीड़-भाड़ के बावजूद तो उसकी खुशी अलग ही होती थी, बचा हुआ राशन कोटेदार, रात में बनियों को बेंच देते थे, इस तरह से कोटेदार का साम्राज्य फल-फूल रहा था, एक बार किसी ने कोटेदार की शिकायत की तो हमारे गांव में कुछ अधिकारी आए, तो उन्होंने गांव वालों से पूछताछ की, गांव के लोगों की मैं इस बात की प्रसंशा करना चाहूंगा कि उन्होंने सच ही बोला, लेकिन कोटेदार ने रूपये-पैसे देकर मामले को रफा-दफा कर दिया, उसके बाद कोटेदार में कुछ सुधार आया- जिन BPL कार्ड धारकों को तीन महीने में एक बार राशन मिलता था, उनको हर महीने राशन मिलने लगा। और कुछ गेहूं पीले कार्ड वालों को भी मिलने लगे। और अब कोटेदार सभी गांवो का राशन एक साथ न बांटकर, अलग-अलग दिनों में बांटते थे। सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन ये सिलसिला सिर्फ तीन महीने तक ही चल सका फिर कोटेदार सभी गांवो का राशन एक ही दिन बांटता था और अगले दिन गायब, ऐसा की महीनों तक चला। फिर एक बार SDM ने छापा मारा और कोटेदार का कोटा चला गया। उसके बाद कोटेदार ने बहुत कोशिशे कि मगर कोटा वापस न ला सके। समय बीतता गया फिर वही कोटेदार झोलाछाप डॉक्टर बन गए, गांव-गांव जाकर लोगों को दवाइयां देते थे,अब अपने खेतों पर भी खुद ही काम करने लगे जो उसने पहले कभी नहीं करत थे। अब वह मज़दूरों के बजाय खुद हल चलाने को मजबूर थे क्योंकि आमदनी सीमित हो चुकी थीं। लेकिन गांव में उनका सम्मान अब भी बरकरार था,अब गांव में हम लोग उन्हें 'डाक्टर बाबा' कहते थे। वे उम्र में बूढ़े नहीं थे लेकिन साख में काफी बड़े थे इसलिए गांव में ज्यादातर लोग उन्हें बाबा, ताऊ,चाचा ही कहते थे। गांव वालों तो उन्हें कब का माफ कर चुके थे लेकिन शायद ईश्वर ने उन्हें माफ़ नहीं किया था, एक बार वो गम्भीर रूप से बीमार हो गए और काफी दिन तक वो अस्पताल के बिस्तर पर रहे। उन्हें हेपेटाइटिस सीरीज की कोई बीमारी थी, जिसमें 15 दिन बाद पूरा खून बदलना पड़ता था। धीरे-धीरे वो कंगाल हो गए,पहले तो परिवार वालों ने, रिश्तेदारों ने काफी मदद की लेकिन धीरे-धीरे सभी ने पल्ला झाड़ लिया। और अंततः वो स्वर्ग सिधार गए। राजाराम का इस दुनिया से जाना, उनके घरवालों के लिए किसी बड़ी विपदा से कम नहीं था, उनके दो लड़के राजू तथा सतेन्द्र थे और चार लड़कियां थीं। बड़े लड़के राजू की सादी उन्होंने बहुत पहले ही कर दी थी, अब राजू के दो लड़के रवि,शिवा हैं। और कोटेदार ने एक लड़की की भी शादी करी थी। अभी तीन लड़कियों और एक लड़के की शादी होना बाकी था, कोटेदार की मृत्यु के बाद, कोटेदार के भाइयों में बंटवारा हो गया और ट्रैक्टर-ट्रॉली, थ्रेशर ये सारी चीजें कोटेदार के बड़े भाई के हिस्से में आ गई। अब तक कोटेदार का लड़का राजू ट्रैक्टर से लोगों के खेत जोतता था, किसानों का गन्ना मिल तक पहुंचाता था,यहीं उसकी कमाई का जरिया था, राजू कभी अपने खेतों में कुदाल- फावड़ा लेकर नहीं गया था, मगर अब वह भी मजबूर था और कर्ज़ में डूबा हुआ था अपने पिताजी की बीमारी का। लेकिन फिर भी राजू ने बहुत मेहनत की और पैसे इकट्ठा किए, सबका कर्ज़ अदा किया और जल्द ही वह इस लायक हो गया कि अपनी एक बहन की शादी कर सकें। अपनी एक बहन की शादी कर दी। अब कोटेदार के परिवार में कोटेदार की विधवा पत्नी, दो लड़कियां दो लड़के बहू और दो पोते थे।कोटेदार का परिवार अब फिर से खुशहाल जीवन जीने लगा।

शायद ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था कोटेदार की विधवा पत्नी की हार्ड अटैक से मौत हो गई, उनके घर में फिर से दुख के बादल छा गए, और करीब एक साल के बाद कोटेदार की बहू यानी राजू की पत्नी की अचानक मौत हो गई, मौत का कारण सीने में तेज दर्द का होना था। अब कोटेदार का घर पूरी तरह से बिखर गया था, बड़ा लड़का राजू जो पहले बहुत ही सीधा था, अब धीरे-धीरे शराब पीने लगा फिर शराब का आदी हो गया, और छोटा लड़का सत्येंद्र जो पहले एक राजकुमार जैसा जीवन व्यतीत करता था अब वह हरियाणा की एक कम्पनी में मजदूरी करता है।

पहले जिस घर में कभी सुख-सुविधाओं का अंबार था, आज वहां खामोशी और अभाव का डेरा है। 

कहानी की सीख :

"अन्याय और भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा महल कभी टिकाऊ नहीं होता।" यह कहानी हमें सिखाती है कि हम दूसरों का हक मारकर जो सुख बटोरते हैं, वह न केवल अस्थायी होता है, बल्कि अंत में हमारे अपनों के लिए दुखों का कारण भी बनता है। इंसान अपने कर्मों की सजा इसी जन्म में और अक्सर अपने परिवार की बर्बादी के रूप में देखता है।

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