Rare Earth Elements में भारत की स्थिति : चुनौतियाँ और संभावनाएँ
Rare Earth Elements (REEs) आधुनिक विश्व की उन्नत तकनीक की रीढ़ बन चुके हैं। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा संयंत्र, पवन टर्बाइन, रक्षा उपकरण, मिसाइल प्रणाली और अंतरिक्ष तकनीक—इन सभी में दुर्लभ मृदा तत्वों की अनिवार्य भूमिका है। 21वीं सदी को “ग्रीन टेक्नोलॉजी और डिजिटल युग” कहा जा रहा है, और इस युग में REEs का रणनीतिक महत्व अत्यधिक बढ़ गया है।
Rare Earth Elements क्या हैं?
Rare Earth Elements कुल 17 तत्वों का समूह हैं, जिनमें लैंथेनाइड श्रृंखला (15 तत्व) तथा स्कैंडियम और इट्रियम शामिल हैं। ये तत्व पृथ्वी में बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं और इनका खनन व प्रसंस्करण तकनीकी रूप से जटिल होता है।
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भारत में Rare Earth Elements की उपलब्धता
भारत दुर्लभ मृदा संसाधनों की दृष्टि से विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। भारत के पास विश्व के लगभग 6–7% Rare Earth संसाधन होने का अनुमान है। ये तत्व मुख्यतः मोनाज़ाइट रेत में पाए जाते हैं, जो भारत के तटीय क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
भारत में REEs के प्रमुख क्षेत्र:
केरल
तमिलनाडु
आंध्र प्रदेश
ओडिशा
पश्चिम बंगाल
इन क्षेत्रों की तटीय बालू में थोरियम और लैंथेनम जैसे महत्वपूर्ण तत्व पाए जाते हैं, जो भारत को भविष्य की परमाणु और हरित ऊर्जा रणनीति में मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
उत्पादन और प्रसंस्करण में भारत की स्थिति
हालाँकि संसाधनों की दृष्टि से भारत समृद्ध है, लेकिन उत्पादन और प्रसंस्करण के क्षेत्र में भारत अभी पीछे है। भारत में Rare Earth का खनन और परिशोधन मुख्य रूप से Indian Rare Earths Limited (IREL) द्वारा किया जाता है, जो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो:
चीन का Rare Earth उत्पादन पर लगभग 60–70% वर्चस्व है
चीन प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला में भी अग्रणी है
भारत तकनीक, निवेश और निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी के कारण प्रतिस्पर्धा में पिछड़ा हुआ है
भारत के सामने प्रमुख चुनौतियाँ
तकनीकी कमी – उन्नत प्रसंस्करण तकनीक का अभाव
पर्यावरणीय चिंताएँ – तटीय खनन से पारिस्थितिकी पर प्रभाव
निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी
नीतिगत और नियामक जटिलताएँ
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का प्रभुत्व

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सरकारी पहल और नीतिगत प्रयास
भारत सरकार ने Rare Earth Elements को रणनीतिक और महत्वपूर्ण खनिज की श्रेणी में रखा है। हाल के वर्षों में कई पहल की गई हैं:
आत्मनिर्भर भारत अभियान
Quad देशों (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के साथ सहयोग
निजी निवेश को बढ़ावा देने के प्रयास
रक्षा और हरित ऊर्जा क्षेत्र में घरेलू उपयोग को प्रोत्साहन
भारत के लिए संभावनाएँ
भारत के लिए Rare Earth Elements केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक महत्व भी रखते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और सेमीकंडक्टर उद्योग में बढ़ती मांग भारत को एक मजबूत अवसर प्रदान करती है।
यदि भारत:
तकनीकी क्षमता विकसित करे
निजी क्षेत्र को शामिल करे
पर्यावरण-संतुलित खनन को बढ़ावा दे
वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करे
तो वह आने वाले वर्षों में Rare Earth क्षेत्र में एक प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बन सकता है।
निष्कर्ष
Rare Earth Elements 21वीं सदी के “रणनीतिक खनिज” हैं। संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद भारत अभी इस क्षेत्र की वास्तविक क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाया है। उचित नीति, निवेश और तकनीकी विकास के माध्यम से भारत न केवल अपनी घरेलू आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यह क्षेत्र भारत की आर्थिक वृद्धि, राष्ट्रीय सुरक्षा और हरित भविष्य—तीनों के लिए अत्यंत निर्णायक सिद्ध हो सकता है।
Thank you !

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