क्या भारत दक्षिण एशिया में भरोसा जीत पा रहा है?


दक्षिण एशिया भारत की विदेश नीति का वह क्षेत्र है जहाँ उसकी शक्ति, सीमाएँ और मंशा—तीनों की एक साथ परीक्षा होती है। भौगोलिक दृष्टि से भारत इस क्षेत्र का स्वाभाविक केंद्र है, लेकिन राजनीतिक रूप से वही स्थिति उसे सबसे अधिक सतर्क रहने को मजबूर करती है। पाकिस्तान से लेकर नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और भूटान तक—भारत के प्रत्येक पड़ोसी देश के साथ संबंध अलग-अलग चुनौतियाँ और संभावनाएँ लेकर आते हैं। ऐसे में भारत की दक्षिण एशिया नीति केवल कूटनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि भरोसा, धैर्य और निरंतर संवाद की प्रक्रिया बन जाती है।

(India- Bhutan- Relationship)

स्वतंत्रता के बाद भारत ने दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग को प्राथमिकता देने की कोशिश की। नेहरू काल की नीति आदर्शवादी थी, जिसमें गुटनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर ज़ोर दिया गया। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि क्षेत्रीय राजनीति केवल साझा इतिहास और सांस्कृतिक निकटता से संचालित नहीं होती। राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया, आंतरिक अस्थिरता और पहचान की राजनीति ने पड़ोसी देशों को भारत के प्रति कभी सहयोगी तो कभी संदेहपूर्ण बना दिया।

दक्षिण एशिया में भारत की नीति की सबसे जटिल चुनौती पाकिस्तान के साथ संबंध रहे हैं। कश्मीर विवाद, सीमा पार आतंकवाद और लगातार अविश्वास ने इस रिश्ते को लगभग स्थायी संकट में बदल दिया है। भारत की ओर से संवाद और शांति प्रयास समय-समय पर हुए, लेकिन हर पहल किसी न किसी घटना के कारण पटरी से उतरती रही। इसका प्रभाव केवल द्विपक्षीय नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्रीय सहयोग ढाँचे—विशेषकर SAARC—को निष्क्रिय करता चला गया। यह स्थिति बताती है कि दक्षिण एशिया में भारत की नीति सुरक्षा और कूटनीति के बीच लगातार संतुलन साधने का प्रयास है।

(India -Nepal- Relationship)

इसके विपरीत, बांग्लादेश के साथ भारत के संबंध अपेक्षाकृत सकारात्मक उदाहरण पेश करते हैं। सीमा समझौते, संपर्क परियोजनाएँ और आर्थिक सहयोग ने यह दिखाया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर संवाद से जटिल मुद्दों को भी सुलझाया जा सकता है। हालांकि, शरणार्थी संकट और आंतरिक राजनीति जैसे प्रश्न समय-समय पर तनाव पैदा करते हैं, फिर भी यह रिश्ता भारत की दक्षिण एशिया नीति की व्यवहारिक सफलता के रूप में देखा जाता है।

नेपाल और श्रीलंका के साथ संबंध भारत की नीति की संवेदनशीलता को उजागर करते हैं। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और भारत-विरोधी भावनाओं का उभार यह संकेत देता है कि भारत की भूमिका को अक्सर “बड़े भाई” की तरह देखा जाता है, जो संदेह और असहजता पैदा करता है। श्रीलंका में तमिल मुद्दे और हालिया आर्थिक संकट के दौरान भारत की सहायता ने एक बार फिर यह दिखाया कि मानवीय सहयोग और राजनीतिक संतुलन साथ-साथ चलने चाहिए। यहाँ भारत के सामने चुनौती यह है कि वह सहायता प्रदान करते हुए संप्रभुता के प्रति सम्मान भी बनाए रखे।

(Maldives-India - Relationship)

मालदीव और भूटान जैसे छोटे देशों के साथ भारत के रिश्ते अपेक्षाकृत स्थिर रहे हैं, लेकिन यहाँ भी बाहरी शक्तियों की भूमिका तेजी से बढ़ी है। विशेषकर चीन का आर्थिक और रणनीतिक विस्तार दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहा है। चीन की बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ और निवेश कई देशों को आकर्षित करते हैं, जिससे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। यह स्थिति भारत को केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय एक दीर्घकालिक और आकर्षक विकास मॉडल प्रस्तुत करने की आवश्यकता की ओर इशारा करती है।

क्षेत्रीय सहयोग के संदर्भ में SAARC की निष्क्रियता भारत की दक्षिण एशिया नीति की एक बड़ी विफलता मानी जाती है। भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण यह मंच लगभग ठहराव की स्थिति में है। इसके विकल्प के रूप में भारत ने BIMSTEC और उप-क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाया है। यह रणनीति व्यावहारिक है, लेकिन यह भी सच है कि दक्षिण एशिया की साझा समस्याओं—गरीबी, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन—का समाधान व्यापक क्षेत्रीय सहयोग के बिना अधूरा रह सकता है।

2014 के बाद भारत की “Neighbourhood First Policy” ने दक्षिण एशिया को विदेश नीति के केंद्र में रखने की कोशिश की। कनेक्टिविटी, ऊर्जा सहयोग और विकास सहायता को प्राथमिकता दी गई। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की वैक्सीन और मानवीय सहायता ने उसकी सॉफ्ट पावर को मजबूत किया। लेकिन इन पहलों की निरंतरता और स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप क्रियान्वयन पर सवाल भी उठे हैं। केवल प्रतीकात्मक पहलें दीर्घकालिक भरोसा नहीं बना सकतीं।

दक्षिण एशिया भारत के लिए अवसरों का क्षेत्र भी है। साझा सांस्कृतिक विरासत, युवा आबादी और आर्थिक संभावनाएँ भारत को स्वाभाविक नेतृत्व की स्थिति में लाती हैं। यदि भारत व्यापार, डिजिटल संपर्क और ऊर्जा सहयोग को प्राथमिकता देता है, तो यह क्षेत्रीय विकास का इंजन बन सकता है। लेकिन नेतृत्व केवल आकार या शक्ति से नहीं, बल्कि भरोसे और समावेशन से स्थापित होता है।

भारत की दक्षिण एशिया नीति की असली परीक्षा इसी भरोसे में निहित है। पड़ोसी देशों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप के आरोप, आर्थिक असमानताएँ और सुरक्षा चिंताएँ इस भरोसे को कमजोर करती हैं। भारत को यह स्वीकार करना होगा कि प्रभावी पड़ोसी नीति के लिए धैर्य, लचीलापन और संवाद की निरंतरता अनिवार्य है।

निष्कर्षतः, भारत की दक्षिण एशिया नीति एक अधूरी परियोजना नहीं, बल्कि एक चलती हुई प्रक्रिया है। इसमें सफलताएँ भी हैं और स्पष्ट सीमाएँ भी। भारत यदि अपनी शक्ति के साथ संवेदनशीलता और व्यावहारिकता जोड़ पाता है, तो दक्षिण एशिया टकराव के क्षेत्र से सहयोग और साझा समृद्धि के मंच में बदल सकता है। यही भारत के क्षेत्रीय नेतृत्व की असली कसौटी होगी



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