भारत की विदेश नीति नेहरू से मोदी तक।


भारत की विदेश नीति देश की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास से सीधे जुड़ी हुई है। 1947 में आज़ादी के बाद भारत को न केवल अपने आंतरिक ढाँचे को मजबूत करना था, बल्कि एक ऐसे विश्व में अपनी जगह भी बनानी थी जो शीत युद्ध, औपनिवेशिक विरासत और वैश्विक असमानताओं से घिरा हुआ था। समय के साथ-साथ भारत की विदेश नीति बदली, पर उसका मूल उद्देश्य—राष्ट्रीय हितों की रक्षा—कभी नहीं बदला। नेहरू से लेकर मोदी तक की यह यात्रा आदर्शवाद, यथार्थवाद और व्यावहारिक कूटनीति के विभिन्न चरणों से होकर गुज़री है।

(Image courtesy : India Today)

स्वतंत्र भारत की विदेश नीति की नींव पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी। नेहरू का दृष्टिकोण आदर्शवादी था, जिसमें शांति, उपनिवेशवाद का विरोध और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर ज़ोर दिया गया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) इसी सोच की उपज था। भारत न तो अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट में शामिल हुआ और न ही सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी गुट में। नेहरू का मानना था कि नवस्वतंत्र देशों को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखनी चाहिए। यह नीति नैतिक रूप से मजबूत थी और भारत को वैश्विक मंच पर एक नैतिक आवाज़ प्रदान करती थी, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस आदर्शवाद ने कभी-कभी सुरक्षा और यथार्थवादी हितों को पीछे छोड़ दिया।

1962 का भारत-चीन युद्ध नेहरू युग की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। पंचशील और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति के बावजूद चीन के साथ संघर्ष ने यह दिखाया कि केवल नैतिक सिद्धांत पर्याप्त नहीं होते। इस घटना के बाद भारत की विदेश नीति में धीरे-धीरे यथार्थवाद का प्रवेश शुरू हुआ। नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में यह बदलाव स्पष्ट दिखा, खासकर 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।

इंदिरा गांधी के दौर को भारत की विदेश नीति में एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस समय भारत ने अधिक आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ अंतरराष्ट्रीय मामलों में हस्तक्षेप किया। 1971 का बांग्लादेश युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण भारत की कूटनीतिक और सैन्य क्षमता का स्पष्ट उदाहरण है। इसी दौर में सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि हुई, जिससे यह संकेत मिला कि भारत पूरी तरह गुटनिरपेक्ष रहते हुए भी अपने रणनीतिक हितों के लिए झुकाव दिखा सकता है। यह युग विदेश नीति के आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर संक्रमण का प्रतीक था।

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1980 के दशक में राजीव गांधी ने विदेश नीति में तकनीक, आधुनिकता और युवा नेतृत्व का दृष्टिकोण जोड़ा। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ संवाद बढ़ाने और वैश्विक मंच पर भारत की छवि को आधुनिक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। हालांकि, श्रीलंका में IPKF की भूमिका यह भी दिखाती है कि क्षेत्रीय हस्तक्षेप हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं देता। यह अनुभव भारत की “पड़ोसी पहले” नीति के लिए एक महत्वपूर्ण सीख बना।

1991 का आर्थिक उदारीकरण भारत की विदेश नीति में एक और बड़ा परिवर्तन लेकर आया। पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारत ने “Look East Policy” अपनाई और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक संबंधों को प्राथमिकता दी। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत ने एक बहुध्रुवीय विश्व में अपने लिए नए अवसर खोजे। इस दौर में विदेश नीति का केंद्रबिंदु आर्थिक कूटनीति बन गया, जहाँ व्यापार, निवेश और तकनीक को राष्ट्रीय हितों से जोड़ा गया।

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में विदेश नीति को रणनीतिक स्पष्टता मिली। 1998 के परमाणु परीक्षणों ने भारत को एक घोषित परमाणु शक्ति बना दिया। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन लंबे समय में इसने भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत किया। लाहौर बस यात्रा जैसी पहलें यह दिखाती हैं कि सुरक्षा कठोरता के साथ-साथ संवाद की नीति भी अपनाई गई।

डॉ. मनमोहन सिंह के दौर में भारत की विदेश नीति अपेक्षाकृत शांत लेकिन प्रभावी रही। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता इस काल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इससे भारत को वैश्विक परमाणु व्यवस्था में मुख्यधारा में आने का अवसर मिला। इस दौर में बहुपक्षीय कूटनीति, G20 और BRICS जैसे मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका बढ़ी।

2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति अधिक सक्रिय, दृश्यमान और व्यक्तित्व-केंद्रित हो गई। “Neighbourhood First”, “Act East”, “Indo-Pacific” और “Vishwaguru” जैसे शब्द विदेश नीति के नए प्रतीक बने। मोदी सरकार ने प्रवासी भारतीयों, रक्षा कूटनीति और आर्थिक साझेदारी पर विशेष ध्यान दिया। क्वाड, भारत-EU संबंधों की मजबूती और अफ्रीका-मध्य एशिया तक बढ़ती सक्रियता इसी नीति का हिस्सा हैं।

हालाँकि, आलोचक यह भी कहते हैं कि वर्तमान विदेश नीति में कभी-कभी प्रतीकवाद वास्तविक परिणामों से आगे निकल जाता है। बड़े मंचों पर भाषण और अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पड़ोसी देशों—नेपाल, श्रीलंका, मालदीव—के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव यह दिखाते हैं कि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। चीन के साथ सीमा विवाद और वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की स्थिति भी निरंतर परीक्षा ले रही है।

कुल मिलाकर, भारत की विदेश नीति एक स्थिर लेकिन विकसित होती हुई प्रक्रिया रही है। नेहरू का आदर्शवाद, इंदिरा गांधी का निर्णायक नेतृत्व, उदारीकरण के बाद की आर्थिक कूटनीति और मोदी युग की सक्रियता—ये सभी चरण भारत की विदेश नीति की विकास यात्रा के हिस्से हैं। किसी एक दौर को पूरी तरह सही या गलत कहना इतिहास को सरल बना देना होगा।

निष्कर्षतः, भारत की विदेश नीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह किस हद तक आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच संतुलन बना पाता है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। एक संतुलित, समावेशी और दीर्घकालिक दृष्टि ही भारत को वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति बना सकती है।


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