मीडिया और लोकतंत्र: चौथा स्तंभ या सत्ता का खिलौना?
प्रस्तावना
लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से भी होती है जो उसे जीवंत बनाए रखती हैं। इन संस्थाओं में मीडिया को “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। इसका कारण है कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के साथ मीडिया जनता और सत्ता के बीच संवाद का पुल बनाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मीडिया आज भी अपनी मूल भूमिका निभा रहा है या धीरे-धीरे सत्ता और बाज़ार का खिलौना बनता जा रहा है?
मीडिया की ऐतिहासिक भूमिका
मीडिया का लोकतंत्र में योगदान कोई नया नहीं है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में यूरोप और अमेरिका में अखबारों ने जनचेतना जगाने का कार्य किया। भारत में भी अंग्रेज़ों के खिलाफ़ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘केसरी’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’ और ‘हरिजन’ जैसे अखबारों ने जनता को आवाज़ दी। उस दौर में मीडिया न केवल सूचना का माध्यम था बल्कि स्वतंत्रता की लड़ाई का हथियार भी था। इससे यह साबित होता है कि जब मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष रहता है तो वह लोकतंत्र को मज़बूत बनाता है।
लोकतंत्र में मीडिया की ताकत
लोकतंत्र में जनता को सशक्त बनाने के लिए सूचना का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है। मीडिया वही सूचना जनता तक पहुँचाता है, जिसे जानना उसका अधिकार है।
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मीडिया सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है।
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जनता की समस्याओं को सामने लाता है।
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विपक्ष और सिविल सोसायटी को मंच उपलब्ध कराता है।
जब मीडिया सही ढंग से काम करता है, तो वह सत्ता को पारदर्शी और जवाबदेह बनाए रखता है। यही कारण है कि उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया।
मीडिया पर बढ़ता बाज़ार और सत्ता का दबाव
21वीं सदी में लोकतंत्र और मीडिया का रिश्ता बदलने लगा। आज मीडिया बड़े कॉर्पोरेट घरानों और राजनीतिक दबावों के बीच फँसा दिखाई देता है। विज्ञापन और TRP की दौड़ में कई बार वह जनता से जुड़े मुद्दों को पीछे छोड़कर सनसनीखेज़ खबरों को प्राथमिकता देने लगता है। इसके अलावा, सत्ता से निकटता या दबाव के कारण वह कई बार जनता की आवाज़ बनने की बजाय सरकार की नीतियों का प्रचारक बन जाता है।
भारत में कई अध्ययनों ने दिखाया है कि मीडिया संस्थानों पर बड़े उद्योगपतियों और राजनीतिक दलों का अप्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ा है। इससे निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया का प्रभाव
टीवी चैनलों ने पिछले दो दशकों में राजनीति को जन-जन तक पहुँचाने का काम किया। लेकिन लगातार “ब्रेकिंग न्यूज़” की संस्कृति ने गहराई और गंभीरता को पीछे छोड़ दिया। आज कई बार टीवी डिबेट्स लोकतांत्रिक चर्चा का मंच बनने की बजाय केवल आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा बन जाती हैं।
डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने नया आयाम दिया है। ट्विटर (अब एक्स), फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स ने जनता को सीधे संवाद का अवसर दिया। लेकिन इनके साथ फेक न्यूज़, ट्रोलिंग और प्रोपेगेंडा का खतरा भी बढ़ा। कई बार गलत सूचनाएँ चुनावी राजनीति को प्रभावित करती हैं, जिससे लोकतंत्र की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में मीडिया और लोकतंत्र का रिश्ता चुनौतीपूर्ण हो गया है।
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अमेरिका में चुनावों के दौरान फेक न्यूज़ और सोशल मीडिया कैंपेन ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया।
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अफ्रीका और एशिया के कई देशों में पत्रकारों पर हमले और सेंसरशिप बढ़ी है।
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यूरोप में भी मीडिया हाउस कॉर्पोरेट नियंत्रण के कारण आलोचनात्मक पत्रकारिता से समझौता करने लगे हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि लोकतंत्र और मीडिया का संकट केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक चुनौती है।
स्वतंत्र पत्रकारिता की ज़रूरत
लोकतंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता बेहद आवश्यक है। जब पत्रकार बिना डर और दबाव के काम करते हैं, तभी वे सत्ता को आईना दिखा सकते हैं। भारत में हाल के वर्षों में कई स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने सत्ता के खिलाफ़ सच्चाई सामने रखी है। लेकिन इन पर कानूनी और आर्थिक दबाव डाला जाना भी आम हो गया है।
यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र अपनी ही एक अहम ताकत – स्वतंत्र मीडिया – को खोने की ओर बढ़ रहा है?
मीडिया और जनता का रिश्ता
लोकतंत्र में मीडिया का असली मालिक जनता होती है। लेकिन जब जनता ही निष्क्रिय हो जाती है और केवल मनोरंजन या सनसनीखेज़ खबरें देखना चाहती है, तो मीडिया भी उसी दिशा में बढ़ने लगता है। इसलिए लोकतंत्र में केवल मीडिया को दोष देना पर्याप्त नहीं है; जनता को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। एक जागरूक नागरिक ही अच्छे मीडिया की माँग कर सकता है।
निष्कर्ष
मीडिया का लोकतंत्र में महत्व असंदिग्ध है। यह सत्ता को जवाबदेह बनाने, जनता को सशक्त करने और समाज को पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन जब यह सत्ता और बाज़ार का खिलौना बन जाता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाती है।
इसलिए ज़रूरी है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा हो, जनता जागरूक बने और मीडिया अपने मूल दायित्व – सत्य, निष्पक्षता और पारदर्शिता – की ओर लौटे। तभी मीडिया सचमुच लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने के योग्य रहेगा।
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