ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी त्रासदी भूख नहीं है।
भूख तो दिखाई दे जाती है।
सबसे बड़ी त्रासदी वह चुप्पी है, जो भूख के आसपास खड़ी रहती है और बोलने नहीं देती।
उत्तर भारत के एक साधारण से ज़िले के एक साधारण से गाँव की यह बात कोई अपवाद नहीं है।
यह वही कहानी है जो अलग-अलग नामों, अलग-अलग चेहरों और अलग-अलग सरकारों के साथ बार-बार दोहराई जाती है।
गाँव में सरकारी राशन की दुकान है।
काग़ज़ों में वह दुकान गरीबों की सुरक्षा है।
हकीकत में वह स्थानीय राजनीति का सबसे भरोसेमंद औज़ार।
राशन कम मिलता है—यह कोई नई ख़बर नहीं।
नई बात यह है कि लोग इसे अब ख़बर ही नहीं मानते।
लोग जानते हैं कि उन्हें पूरा अनाज नहीं मिल रहा।
लोग यह भी जानते हैं कि गड़बड़ी कहाँ हो रही है।
फिर भी सवाल नहीं उठता।
क्यों?
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| (सरकारी सस्ते राशन की दुकान -Ai generated) |
क्योंकि यह सिर्फ़ राशन का सवाल नहीं रह गया है।
राशन की दुकान चलाने वाला व्यक्ति आज सिर्फ़ दुकानदार नहीं होता।
वह वोटों की गणना में शामिल होता है।
वह नाम जोड़ने-काटने की प्रक्रिया में मौजूद होता है।
वह चुनाव के समय “मैनेजमेंट” का हिस्सा बन जाता है।
यहीं से राशन व्यवस्था राजनीति में बदल जाती है।
चुनाव के महीनों में वही दुकान अचानक दुरुस्त दिखने लगती है।
अनाज समय पर आता है।
तेल भी मिल जाता है।
लोगों को लगता है कि शायद सरकार सुधर गई।
असल में सुधर कुछ नहीं रहा होता,
बस ज़रूरत बदल गई होती है।
यह व्यवस्था ऊपर से नहीं चलती।
यह नीचे से मज़बूत की जाती है।
कोई नेता सीधे यह नहीं कहता कि राशन काटो।
कोई अधिकारी लिखित आदेश नहीं देता।
सब कुछ मौन सहमति से होता है।
अगर कोई शिकायत करता है,
तो जाँच होती है।
फाइल चलती है।
दो-चार दिन के लिए दुकान बंद होती है।
और फिर वही व्यक्ति,
उसी कुर्सी पर,
और ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ बैठा मिलता है।
यह संदेश काफी होता है।
इसके बाद किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
ग्रामीण समाज को अक्सर अंधविश्वासी कहकर खारिज कर दिया जाता है,
लेकिन यहाँ अंधविश्वास नहीं,
'आर्थिक डर 'काम करता है।
जिसके पास विकल्प नहीं होता,
वह बहस नहीं करता।
गरीब के लिए राशन सिर्फ़ भोजन नहीं है।
वह उसकी सामाजिक हैसियत है।
उसकी सुरक्षा है।
और कई बार उसकी चुप्पी की कीमत भी।
यह कहना आसान है कि पढ़े-लिखे लोग क्यों नहीं बोलते।
असल सवाल यह है कि
क्या पढ़ा-लिखा होना सत्ता से टकराने की गारंटी देता है?
ग्रामीण भारत में जवाब अक्सर “नहीं” होता है।
क्योंकि यहाँ शिक्षा रोज़गार की सुरक्षा नहीं देती।
और बिना सुरक्षा के विरोध साहस नहीं,
जोखिम बन जाता है।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे साफ़ बचकर निकलता है—
ऊपर का तंत्र।
नेता कहते हैं—
“हमें जानकारी नहीं थी।”
अधिकारी कहते हैं—
“जाँच जारी है।”
और नीचे बैठा आदमी वही रहता है,
जिसके हाथ में दुकान की चाबी है।
यह व्यवस्था व्यक्तियों से नहीं,
संरचना से चलती है।
इसलिए चेहरे बदलते हैं,
लेकिन कहानी नहीं बदलती।
जब तक राशन, रोज़गार और पहचान—
तीनों को राजनीति से जोड़ा जाता रहेगा,
तब तक गरीब के पास सवाल कम और डर ज़्यादा रहेगा।
यह किसी एक गाँव की कहानी नहीं है।
यह उस देश का आईना है जहाँ लोकतंत्र मतदान केंद्र तक तो पहुँचता है,
लेकिन राशन की दुकान पर आकर अक्सर रुक जाता है।
और शायद यही सबसे बड़ा संकट है।

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