भारत–EU की बढ़ती नज़दीकी: कितना लाभ, कितनी चुनौती?

भारत–यूरोपीय संघ संबंध: अवसर, दावे और ज़मीनी सच्चाइयाँ

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के संबंधों को लेकर हाल के दिनों में जिस तरह की सकारात्मक भाषा और बड़े दावे सामने आए हैं, उन्होंने यह संकेत दिया है कि भारत की विदेश नीति एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। भारत–EU के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को दोबारा गति मिलना, रणनीतिक साझेदारी पर ज़ोर और दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को लेकर बदला हुआ दृष्टिकोण—ये सभी बातें इस रिश्ते को सिर्फ द्विपक्षीय न रखकर क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भों से जोड़ देती हैं। लेकिन किसी भी कूटनीतिक सफलता की तरह, इन दावों को केवल उत्साह के चश्मे से नहीं, बल्कि यथार्थ और संतुलन के साथ देखना ज़रूरी है।

यूरोपीय संघ लंबे समय से भारत का एक अहम व्यापारिक और राजनीतिक साझेदार रहा है। दोनों के बीच व्यापार का दायरा बड़ा है और तकनीक, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन तथा शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएँ लगातार बनी रही हैं। हालिया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि वैश्विक अस्थिरता—चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो, सप्लाई चेन का संकट हो या चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश—EU को भारत के और क़रीब ला रही है। भारत को एक लोकतांत्रिक, स्थिर और उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में यूरोप के लिए भरोसेमंद साझेदार बन सकता है।

(Indian PM and EU Present)

मुक्त व्यापार समझौता (FTA): उम्मीदें और आशंकाएँ

मुक्त व्यापार समझौते को इस पूरे विमर्श का केंद्र माना जा रहा है। समर्थकों का तर्क है कि FTA से भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाज़ारों में बेहतर पहुँच मिलेगी, निवेश बढ़ेगा और रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। साथ ही, इससे भारत की वैश्विक सप्लाई चेन में भूमिका मज़बूत होगी।

लेकिन इसके दूसरे पक्ष को नज़रअंदाज़ करना भी एक बड़ी भूल होगी। भारत के छोटे उद्योग, एमएसएमई सेक्टर और कृषि क्षेत्र पहले ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं। यदि यूरोपीय उत्पाद बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के भारतीय बाज़ार में प्रवेश करते हैं, तो घरेलू उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है। पहले के कुछ FTA अनुभव यह दिखाते हैं कि लाभ हमेशा समान रूप से वितरित नहीं होते।

दक्षिण एशिया पर प्रभाव: दावा या वास्तविकता?

अख़बार में यह संकेत भी मिलता है कि भारत–EU संबंधों की यह नई ऊर्जा पूरे दक्षिण एशिया में बदलाव ला सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा है और EU के साथ नज़दीकी संबंध उसका कूटनीतिक वज़न बढ़ाते हैं।

लेकिन यह मान लेना कि इसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव दक्षिण एशिया के सभी देशों पर पड़ेगा, थोड़ा अतिरंजित लगता है। नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका या मालदीव जैसे देशों की अपनी अलग प्राथमिकताएँ, आर्थिक संरचनाएँ और विदेश नीति के समीकरण हैं। भारत की मज़बूती से उन्हें अवसर मिल सकते हैं, लेकिन यह स्वचालित प्रक्रिया नहीं है।

(Photo source -@narendramodi)

कश्मीर, मानवाधिकार और कूटनीतिक भाषा

कश्मीर और पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर यूरोपीय संघ के रुख में बदलाव को भी एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। निस्संदेह, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष पहले की तुलना में अधिक सुना जा रहा है और EU भारत के आंतरिक मामलों को लेकर अधिक सतर्क भाषा का प्रयोग कर रहा है।

फिर भी, यह सवाल बना रहता है कि क्या यह बदलाव नीतिगत है या केवल कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित है। यूरोपीय संघ की मानवाधिकार संबंधी चिंताएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं और भविष्य में ये मुद्दे फिर उभर सकते हैं।

(India-EU Business Forum)

विदेश नीति और घरेलू राजनीति

इस पूरे विमर्श में विदेश मंत्री के राजनीतिक बयानों को प्रमुखता मिलना भी विचारणीय है। विदेश नीति आमतौर पर राष्ट्रीय सहमति और दीर्घकालिक हितों पर आधारित मानी जाती है। जब इसे घरेलू राजनीतिक बहस से जोड़ दिया जाता है, तो इसका स्वर बदल जाता है। यह ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को पार्टी राजनीति से ऊपर रखकर देखा जाए, ताकि देश की छवि एक स्थिर और जिम्मेदार साझेदार की बनी रहे।

अतीत की तुलना और वर्तमान संदर्भ

2006 से 2013 के दौर का संदर्भ देकर यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि पहले अवसर चूक गए थे और अब उन्हें पकड़ा जा रहा है। इसमें आंशिक सच्चाई हो सकती है, लेकिन यह भी सच है कि उस समय की वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ, यूरोप का आंतरिक संकट और भारत की घरेलू प्राथमिकताएँ अलग थीं। हर दौर की विदेश नीति को उसके संदर्भ में समझना चाहिए, न कि केवल तुलना के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

भरोसा, शर्तें और भविष्य की राह

यूरोपीय संघ को “विश्वसनीय साझेदार” बताना अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन भरोसा हमेशा दोतरफ़ा होता है। EU की पर्यावरण, श्रम अधिकार और डेटा सुरक्षा जैसी शर्तें भारत के लिए चुनौती बन सकती हैं। भारत को अपनी विकास आवश्यकताओं और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के साथ इन शर्तों का संतुलन साधना होगा। यदि यह संतुलन नहीं बन पाया, तो समझौते लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह पाएँगे।

(Indian PM and EU Present)

निष्कर्ष- मेरे नजरिए से 

कुल मिलाकर, भारत–EU संबंधों में नई गति और नई भाषा निश्चित रूप से उत्साहजनक है। यह भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और बदलते कूटनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाती है। लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते को केवल उपलब्धि के रूप में देखने के बजाय, उसके संभावित प्रभावों, जोखिमों और दीर्घकालिक परिणामों पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। सच्ची कूटनीतिक सफलता वही होती है जो न केवल अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रशंसा बटोरती है, बल्कि देश के भीतर आम नागरिक, किसान और छोटे उद्यमी के जीवन में भी ठोस सुधार लाती है।

भारत के लिए यह समय अवसरों से भरा है, लेकिन साथ ही सावधानी की भी माँग करता है। भारत–EU संबंधों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत किस हद तक अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक साझेदारी को आगे बढ़ा पाता है। संतुलन, पारदर्शिता और दीर्घकालिक सोच—यही इस रिश्ते की असली कसौटी होगी।




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