भारत में हर सरकार के पास बताने के लिए नीतियों की लंबी सूची होती है। हर बजट भाषण, हर प्रेस कॉन्फ़्रेंस और हर चुनावी मंच से यही दोहराया जाता है कि “ऐतिहासिक फैसले” लिए गए हैं, “गेम-चेंजर योजनाएँ” लागू हुई हैं और “जनता के जीवन में बड़ा बदलाव” आया है। लेकिन सवाल यह है कि अगर नीतियाँ सच में इतनी प्रभावी हैं, तो आम आदमी की ज़िंदगी अब भी इतनी असुरक्षित, अनिश्चित और संघर्षपूर्ण क्यों है?
यह विरोधाभास आज के भारत की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुका है—नीतियाँ काग़ज़ों पर चमकती हैं, पर ज़मीन पर उनका असर धुंधला है।
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| (भारतीय व्यवस्था की प्रतीकात्मक फोटो) |
नीति और यथार्थ के बीच की खाई
सरकारी दस्तावेज़ों में देश तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। GDP के आँकड़े, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, डिजिटल सेवाओं की गिनती—सब कुछ “सफलता” की कहानी सुनाता है। लेकिन वही देश जब रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के पैमानों पर देखा जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है।
एक युवा डिग्री लेकर दर-दर भटक रहा है।
एक किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के लिए सड़क पर बैठा है।
एक मरीज़ सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए लाइन में खड़ा है।
इन लोगों के लिए नीति कोई रिपोर्ट नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का सवाल है। और यहीं पर सरकार की सबसे बड़ी विफलता उजागर होती है—नीतियाँ बनाते समय ज़मीनी हकीकत को नज़रअंदाज़ करना।
योजनाओं की भरमार, समाधान की कमी
भारत में योजनाओं की कमी कभी नहीं रही। हर मंत्रालय के पास दर्जनों स्कीमें हैं। समस्या उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनकी प्रभावशीलता और ईमानदार क्रियान्वयन है।
कई योजनाएँ एक-दूसरे से टकराती हैं, कई सिर्फ़ नाम बदलकर दोबारा पेश कर दी जाती हैं, और कई इतनी जटिल होती हैं कि जिनके लिए बनाई गईं, वही उनसे बाहर रह जाते हैं। लाभार्थी चुनने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव, भ्रष्टाचार और राजनीतिक प्राथमिकताएँ योजनाओं को खोखला बना देती हैं।
नतीजा यह होता है कि सरकार सफलता के पोस्टर लगाती है और जनता असफलता का बोझ ढोती है।
आँकड़ों का सच और सच के आँकड़े
सरकारें आँकड़ों से शासन करती हैं। लेकिन आँकड़े अक्सर सच्चाई का पूरा चेहरा नहीं दिखाते। बेरोज़गारी दर, महँगाई, कुपोषण या शिक्षा के स्तर—इन सबकी प्रस्तुति इस तरह की जाती है कि तस्वीर बेहतर लगे।
पर ज़मीनी अनुभव आँकड़ों से बहस करता है।
अगर रोज़गार बढ़ रहा है, तो पढ़ा-लिखा युवा हताश क्यों है?
अगर स्वास्थ्य व्यवस्था मज़बूत है, तो निजी अस्पतालों में कर्ज़ क्यों बढ़ रहा है?
यहाँ समस्या सिर्फ़ नीतियों की नहीं, बल्कि ईमानदार आत्ममंथन की कमी की भी है।
जनता की भागीदारी या सिर्फ़ औपचारिकता?
लोकतंत्र में नीति-निर्माण जनता के लिए होता है, जनता के साथ नहीं—यह आज की सच्चाई बनती जा रही है। परामर्श प्रक्रियाएँ अक्सर औपचारिक होती हैं। असहमति को बाधा समझा जाता है, सुझाव को आलोचना।
जब किसान, छात्र, मज़दूर या शिक्षक सवाल उठाते हैं, तो उन्हें “भ्रमित”, “राजनीतिक” या “राष्ट्रविरोधी” कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। यह रवैया नीतियों को और कमजोर बनाता है, क्योंकि बिना सुनने के बनाई गई नीति कभी पूरी तरह काम नहीं करती।
संवेदनशीलता का संकट
शासन केवल नियमों और योजनाओं से नहीं चलता, बल्कि संवेदनशीलता से चलता है। लेकिन आज का शासन मॉडल अक्सर इंसान से ज़्यादा सिस्टम पर भरोसा करता है। फ़ाइलें चलती हैं, निर्देश निकलते हैं, पर मानवीय पीड़ा कहीं खो जाती है।
जब किसी त्रासदी पर पहला बयान “जाँच के आदेश” तक सीमित रह जाता है, तब जनता को एहसास होता है कि उसके दर्द का कोई राजनीतिक मूल्य नहीं है। यही कारण है कि लोगों का भरोसा नीतियों से नहीं, बल्कि संघर्ष से बनता जा रहा है।
जवाबदेही का सवाल
नीतियाँ असफल हों तो जिम्मेदारी कौन ले?
क्या कभी यह स्वीकार किया गया कि कोई नीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई?
जवाबदेही लोकतंत्र की रीढ़ होती है, लेकिन यहाँ उसे कमजोरी समझ लिया गया है। सरकारें आलोचना से बचने के लिए नैरेटिव बदलती हैं, मुद्दा बदल देती हैं, लेकिन जवाब नहीं देतीं। इसका परिणाम यह होता है कि गलतियाँ दोहराई जाती हैं और जनता कीमत चुकाती है।
क्या समाधान है?
समाधान किसी एक कानून या योजना में नहीं है। इसकी शुरुआत सोच बदलने से होगी।
नीति-निर्माण में वास्तविक हितधारकों को शामिल करना
आँकड़ों के साथ ज़मीनी अनुभव को महत्व देना
असहमति को लोकतंत्र की ताकत मानना
और सबसे ज़रूरी—जनता को केवल लाभार्थी नहीं, साझेदार मानना
जब तक नीतियाँ सत्ता के दृष्टिकोण से बनेंगी, ज़िंदगी नहीं बदलेगी। ज़िंदगी तब बदलेगी जब नीति इंसान के अनुभव से निकलेगी।
आज भारत में समस्या नीतियों की कमी की नहीं, दिशा और दृष्टि की कमी की है। सरकारें घोषणाओं में व्यस्त हैं, जबकि जनता समाधान खोज रही है। यह दूरी जितनी बढ़ेगी, लोकतंत्र उतना कमजोर होगा।
क्योंकि सच यही है—
नीतियाँ बनती हैं, ज़िंदगी तब बदलती है जब उन्हें इंसान की तरह समझा जाए।

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